तेरी मुख-समता करी, साहस करि निरसंक।
धूरि परी अरबिंद मुख, चंदहि लग्यौ कलंक॥
- श्री मतिराम, मतिराम सतसई
हे राधिके, तुम्हारे मुख-कमल की समता करना किसी के लिए संभव नहीं। कमल और चंद्रमा ने भी जब यह साहस किया, तो कमल पर पुष्प-रज की धूल बैठ गई और चंद्रमा को कलंक लग गया। भाव यह है कि श्री राधा के मुख की तुलना किसी से करना सर्वथा अनुचित और मूर्खता है।
धूरि परी अरबिंद मुख, चंदहि लग्यौ कलंक॥
- श्री मतिराम, मतिराम सतसई
हे राधिके, तुम्हारे मुख-कमल की समता करना किसी के लिए संभव नहीं। कमल और चंद्रमा ने भी जब यह साहस किया, तो कमल पर पुष्प-रज की धूल बैठ गई और चंद्रमा को कलंक लग गया। भाव यह है कि श्री राधा के मुख की तुलना किसी से करना सर्वथा अनुचित और मूर्खता है।

