नहिं ब्रह्म सों काम क़छु हमको - श्री वल्लभ दास जी

नहिं ब्रह्म सों काम क़छु हमको - श्री वल्लभ दास जी

नहिं ब्रह्म सों काम क़छु हमको, वैकुंठ की राह न जावनी है। [1]
ब्रज की रज में रज ह्वै के मिलूँ, यही प्रीति की रीति निभावनी है॥ [2]
बन 'वल्लभ’ गाय चरायौ करों, यही गवारन की गवारनी है। [3]
नंदनन्द की देहरि सौं धिसीकें, हमें कर्म की रेख मिटावनी है॥ [4]

- श्री वल्लभ दास (पुष्टिमार्गी भक्त)

न हमें ब्रह्म से कोई काम है, न ही वैकुंठ से कुछ लेना-देना; हम तो वैकुंठ की ओर देखना भी नहीं चाहते। [1]

हमारी बस इतनी ही आशा है कि ब्रज की रज में हम भी एक कण बनकर मिल जाएँ—यही प्रीति की रीति हमें निभानी है। [2]

मेरी यह कामना है कि मैं ब्रज का एक ग्वालबाल बनकर ब्रजवासियों के संग गायें चराऊँ। [3]

श्री वल्लभदास जी कहते हैं—“अब श्री नंदनंदन की देहरी पर घिस-घिसकर अपने कर्मों का सारा लेखा-जोखा समाप्त करना है।” [4]