हौं दासी बिन मोल की, तुम्हरी हौं सुकुँवारि - श्री वंशी अलि, श्री राधिका महारास

हौं दासी बिन मोल की, तुम्हरी हौं सुकुँवारि - श्री वंशी अलि, श्री राधिका महारास

हौं दासी बिन मोल की, तुम्हरी हौं सुकुँवारि ।
तुमही नेह निबाहियौ, करियौ मो प्रतिपारि ॥ [1]
ग्रीवा अंचल नाय कैं पगनि नवायौ सीस ।
हौं दासी बिन मोल की तुम हौ मेरी ईस ॥ [2]

- श्री वंशी अलि, श्री राधिका महारास

वंशी अलि जी के रास लीला से सम्बंधित काव्यों में गोपियों का श्री राधा के प्रति प्रियतम भाव है, उनकी उपासना में श्री कृष्ण का ना के बराबर स्थान है । श्री वंशी अलि जी कहते हैं कि जब श्री राधा से महारास गोपियाँ कर रही थी, तब श्री राधा महारास से आलक्षित हो जाती हैं और सब गोपियाँ रुदन करती हैं । तभी श्री राधा से उनकी एक अंतरंग सखी कहती है: हे श्री राधा, मैं तो तुम्हारी बिना मोल की दासी हूँ। हे सुकुँवरि मैं तो सदा से तुम्हारी ही हूँ । हे मेरी प्रतिपाल, अब तुम ही मेरे से नेह निभाओ । [1]

मैं अपनी ग्रीवा को झुका कर, आपके श्री चरणों में शीश झुका कर कहती हूँ कि मैं तो तुम्हारी बिना मोल के दासी हूँ, केवल तुम ही मेरी इष्ट हो । [2]