भक्त आहिं बहु भाँति के - श्री ध्रुवदास जी, बयालीस लीला, मन शिक्षा लीला (25)

भक्त आहिं बहु भाँति के - श्री ध्रुवदास जी, बयालीस लीला, मन शिक्षा लीला (25)

भक्त आहिं बहु भाँति के, तिनमें बहुतक भेद ।
बिनु विवेक मिलिबौ तहौं, मन पावै अति खेद ॥

- श्री ध्रुवदास जी, बयालीस लीला, मन शिक्षा लीला (25)

भगवान के भक्त अनेक प्रकार के होते हैं और उनके भावों में भी अनेक भेद होते हैं—दास्य, सख्य आदि। इसलिए जो साधक भक्तों के इस तारतम्य को बिना समझे संग करता है, उसे पहले विवेकपूर्वक अपने भक्ति-भाव के अनुकूल संग चुनना चाहिए; अन्यथा अंत में उसे खेद ही प्राप्त होगा।