कोऊ महेश रमेश मनावत, कोऊ धनेस गनेसहिं साधा। [1]
कोऊ नृसिंह की सेव करैं, औ कोऊ रघुचन्दहिं को अवराधा॥ [2]
त्यों दरियाव जू श्री नँद नन्द चहौं, तजि और न स्वामिनी राधा। [3]
श्री वृषभानु कुमारि कृपा करि, दे पद पंकज प्रेम अगाधा॥ [4]
- ब्रज के सवैया
कोई शिवजी की भक्ति करता है, कोई भगवान विष्णु को प्रसन्न करता है, कोई धन के देवता कुबेर की आराधना करता है, और कोई गणेश जी का भजन करता है। [1]
कोई नरसिंह भगवान की सेवा करता है, और किसी के आराध्य देव रघुनन्दन भगवान राम हैं। [2]
परंतु मैं तो केवल दया के अनन्त सागर युगल सरकार श्रीकृष्ण और उनकी स्वामिनी श्रीराधा को ही चाहता हूँ, अन्य किसी को नहीं। [3]
हे श्री वृषभानु-कुमारी श्रीराधा! कृपा कर मुझे अपने चरण-कमलों का अगाध प्रेम प्रदान करो—मेरी बस यही अभिलाषा है। [4]
कोऊ नृसिंह की सेव करैं, औ कोऊ रघुचन्दहिं को अवराधा॥ [2]
त्यों दरियाव जू श्री नँद नन्द चहौं, तजि और न स्वामिनी राधा। [3]
श्री वृषभानु कुमारि कृपा करि, दे पद पंकज प्रेम अगाधा॥ [4]
- ब्रज के सवैया
कोई शिवजी की भक्ति करता है, कोई भगवान विष्णु को प्रसन्न करता है, कोई धन के देवता कुबेर की आराधना करता है, और कोई गणेश जी का भजन करता है। [1]
कोई नरसिंह भगवान की सेवा करता है, और किसी के आराध्य देव रघुनन्दन भगवान राम हैं। [2]
परंतु मैं तो केवल दया के अनन्त सागर युगल सरकार श्रीकृष्ण और उनकी स्वामिनी श्रीराधा को ही चाहता हूँ, अन्य किसी को नहीं। [3]
हे श्री वृषभानु-कुमारी श्रीराधा! कृपा कर मुझे अपने चरण-कमलों का अगाध प्रेम प्रदान करो—मेरी बस यही अभिलाषा है। [4]

