मो सम कौन कुटिल खल कामी - श्री सूरदास

मो सम कौन कुटिल खल कामी - श्री सूरदास

(राग जंगला तिताला)
मो सम कौन कुटिल खल कामी।
जेहिं तनु दियौ ताहिं बिसरायौ, ऐसौ नमकहरामी ॥ [1]
भरि भरि उदर विषय कों धावौं, जैसे सूकर ग्रामी।
हरिजन छांड़ि हरी-विमुखन की निसदिन करत गुलामी ॥ [2]
पापी कौन बड़ो है मोतें, सब पतितन में नामी ।
सूर, पतित कों ठौर कहां है, सुनिए श्रीपति स्वामी ॥ [3]

- श्री सूरदास

श्री सूरदास जी विनयपूर्वक शब्दों में कहते हैं कि हे प्रभु मेरे समान कुटिल, खल एवं कामी जीव विश्व में कौन होगा ? मेरे समान नमक हरामी कौन होगा क्यूँकि जिस प्रभु ने मुझे यह सुरदुर्लभ मानव देह प्रदान किया है मैंने उसको ही भुला दिया । [1]

गाँव के सुअर के समान मैं विषयों में आसक्त होकर पेट भरने के लिए कहाँ कहाँ नहीं भटकता हूँ । मैं भक्तों एवं हरिजन का संग (एवं सेवा) त्याग कर हरिविमुख जन (जो माया में ही पूर्ण रूप से आसक्त हैं) की दिन रात ग़ुलामी करने में लगा हूँ । [2]

मेरे से बड़ा पापी कौन होगा इस विश्व में, मैं तो समस्त पापियों में नामी हूँ । श्री सूरदास जी भगवान से प्रार्थना करते हैं कि मेरे जैसे पतित की ठौर आप जैसे पतित पावन के चरणों के अतिरिक्त अन्य कहाँ होगी (अर्थात् नहीं है) । [3]