नित्यानंद कदम्ब केलि, वृंदावन शोभा ।
कोटि कोटि सुरराज रंक ह्वै, लागत लोभा ॥
- श्री गदाधर भट्ट, श्री गदाधर भट्ट जी की वाणी, योग पीठ (14)
श्री वृन्दावन की वह दिव्य शोभा, जहाँ कदम्ब के वृक्षों के नीचे श्री राधा-कृष्ण की नित्य आनंदमयी लीलाएँ (केलि) होती रहती हैं, अत्यंत अद्भुत है। उस अनुपम छवि को निहारने के लिए करोड़ों-करोड़ इंद्र (देवराज) भी स्वयं को दरिद्र (रंक) मानकर उस रस को पाने का लोभ करते हैं।
कोटि कोटि सुरराज रंक ह्वै, लागत लोभा ॥
- श्री गदाधर भट्ट, श्री गदाधर भट्ट जी की वाणी, योग पीठ (14)
श्री वृन्दावन की वह दिव्य शोभा, जहाँ कदम्ब के वृक्षों के नीचे श्री राधा-कृष्ण की नित्य आनंदमयी लीलाएँ (केलि) होती रहती हैं, अत्यंत अद्भुत है। उस अनुपम छवि को निहारने के लिए करोड़ों-करोड़ इंद्र (देवराज) भी स्वयं को दरिद्र (रंक) मानकर उस रस को पाने का लोभ करते हैं।

