प्रीति की रीति रंगीलीये जानें ।
लिये रहत हित नित्य ललित कौं तन मन धन इनही कौं माने ॥ [1]
तैसीये ललित महा सुख दैंनीं अद्भुत रूप रँग रस सानें ।
और न इन्हें सुहाय रसिक कौं आनंद केलि सहज ही आनें ॥ [2]
- श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, श्रृंगार रस के पद (37)
प्रीति की रीति तो रंगीली [श्री राधा] ही जानती हैं, जो अपना तन, मन, धन श्री श्याम सुंदर को ही मानकर नित्य ही अपने हृदय से प्रेमपूर्वक लगायी रखती हैं । [1]
वैसे ही श्ी श्यामसुंदर भी इन्हें महा सुख देते हैं जो इन्हीं के अद्बुत रूप एवं रँग से भरे रहते हैं । श्री ललित किशोरी देव जी कहते हैं कि सहचरियों और प्रिया प्रियतम को और कुछ नहीं भाता, वे तो सहज रूप से दिव्य केलि आनंद को ही ग्रहण करते रहते हैं । [2]
लिये रहत हित नित्य ललित कौं तन मन धन इनही कौं माने ॥ [1]
तैसीये ललित महा सुख दैंनीं अद्भुत रूप रँग रस सानें ।
और न इन्हें सुहाय रसिक कौं आनंद केलि सहज ही आनें ॥ [2]
- श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, श्रृंगार रस के पद (37)
प्रीति की रीति तो रंगीली [श्री राधा] ही जानती हैं, जो अपना तन, मन, धन श्री श्याम सुंदर को ही मानकर नित्य ही अपने हृदय से प्रेमपूर्वक लगायी रखती हैं । [1]
वैसे ही श्ी श्यामसुंदर भी इन्हें महा सुख देते हैं जो इन्हीं के अद्बुत रूप एवं रँग से भरे रहते हैं । श्री ललित किशोरी देव जी कहते हैं कि सहचरियों और प्रिया प्रियतम को और कुछ नहीं भाता, वे तो सहज रूप से दिव्य केलि आनंद को ही ग्रहण करते रहते हैं । [2]

