डूबै सो बोलै नहीं, बोलै सो अनजान।
गहरौ प्रेम-समुद्र कोउ, डूबै चतुर सुजान॥
- ब्रज के दोहे
जो इस दिव्य प्रेम-समुद्र की अगाध गहराइयों में डूब जाता है, वह मौन हो जाता है और कुछ कह नहीं पाता; और जो इसके विषय में व्यर्थ की बातें करता है, वह वास्तव में इसके मर्म से अनभिज्ञ (अनजान) है। इस अति गहरे प्रेम-पयोधि में तो कोई विरला 'चतुर सुजान' (परम विवेकी रसिक) ही निमग्न हो पाता है।
गहरौ प्रेम-समुद्र कोउ, डूबै चतुर सुजान॥
- ब्रज के दोहे
जो इस दिव्य प्रेम-समुद्र की अगाध गहराइयों में डूब जाता है, वह मौन हो जाता है और कुछ कह नहीं पाता; और जो इसके विषय में व्यर्थ की बातें करता है, वह वास्तव में इसके मर्म से अनभिज्ञ (अनजान) है। इस अति गहरे प्रेम-पयोधि में तो कोई विरला 'चतुर सुजान' (परम विवेकी रसिक) ही निमग्न हो पाता है।

