(राग आसावरी)
कृष्ण नाम जबतें श्रवण सुन्यो री आली
भूली री भवन हों तो बावरी भई री ।। [1]
भर भर आवें नयन चित हूं न परे चैन
मुख हूं ना आवे बैन तन की दशा कछु औरें भई री।। [2]
जेतैक नेम धर्म कीनेरी मैं बहुविध
अंग अंग भई हूं तो श्रवण मई री ।। [3]
नंददास जाके श्रवनसुने यह गति
माधुरी मूरति केन्धों कैसी दईरी ।। [4]
- श्री नंददास, नंददास ग्रंथावली, पदावली (54)
श्री नंददास जी एक सखी रूप से अन्य सखी से कहते हैं कि - हे सखि ! जब से कानो में कृष्ण का नाम सुना है , तब से मैं अपना घर संसार भूल, बाँवरी बन गयी हूँ । [1]
मेरी आखों से भर भर कर आंसू निकला करते हैं , और मन को चैन नही पड़ रहा है, मुख से कोई शब्द नहीं निकल रहा है, और मेरे शरीर की तो दशा ही कुछ अन्य प्रकार से हो रही है । [2]
मैने जितने भी प्रकार के नियम, धर्म थे कर डाले पर अब तो में अंग अंग से श्रवणमय हो गयी हूँ ! [3]
श्री नंददास जी कहते हैं कि जिनके केवल नाम श्रवण मात्र से मेरी यह दशा हो रही है यदि उनकी रूप माधुरी के कभी दर्शन होंगे तो मेरी क्या दशा होगी ? [4]
कृष्ण नाम जबतें श्रवण सुन्यो री आली
भूली री भवन हों तो बावरी भई री ।। [1]
भर भर आवें नयन चित हूं न परे चैन
मुख हूं ना आवे बैन तन की दशा कछु औरें भई री।। [2]
जेतैक नेम धर्म कीनेरी मैं बहुविध
अंग अंग भई हूं तो श्रवण मई री ।। [3]
नंददास जाके श्रवनसुने यह गति
माधुरी मूरति केन्धों कैसी दईरी ।। [4]
- श्री नंददास, नंददास ग्रंथावली, पदावली (54)
श्री नंददास जी एक सखी रूप से अन्य सखी से कहते हैं कि - हे सखि ! जब से कानो में कृष्ण का नाम सुना है , तब से मैं अपना घर संसार भूल, बाँवरी बन गयी हूँ । [1]
मेरी आखों से भर भर कर आंसू निकला करते हैं , और मन को चैन नही पड़ रहा है, मुख से कोई शब्द नहीं निकल रहा है, और मेरे शरीर की तो दशा ही कुछ अन्य प्रकार से हो रही है । [2]
मैने जितने भी प्रकार के नियम, धर्म थे कर डाले पर अब तो में अंग अंग से श्रवणमय हो गयी हूँ ! [3]
श्री नंददास जी कहते हैं कि जिनके केवल नाम श्रवण मात्र से मेरी यह दशा हो रही है यदि उनकी रूप माधुरी के कभी दर्शन होंगे तो मेरी क्या दशा होगी ? [4]

