विशोकजे, भानुसुते, किशोरिके, राधे, स्वभक्तांभयदेतिवत्सले ।
एकात्त्वमेवासि गतिर्मदीया मतिर्मदीया तब पादयोर्भवेत् ॥
- श्री वंशी अलि, श्री राधा स्तोत्र (17)
श्री राधा जो विशोकजा तथा श्री वृषभानु की पुत्री हैं, वह अपने भक्तों को अभय प्रदान करती हैं एवं उन पर स्नेह की वर्षा करती हैं । श्री राधा ही मेरी एक मात्र गति हैं । श्री राधा ऐसी कृपा करें कि उनके श्री चरणों में ही मेरी अनन्य मति बनी रहे ।
एकात्त्वमेवासि गतिर्मदीया मतिर्मदीया तब पादयोर्भवेत् ॥
- श्री वंशी अलि, श्री राधा स्तोत्र (17)
श्री राधा जो विशोकजा तथा श्री वृषभानु की पुत्री हैं, वह अपने भक्तों को अभय प्रदान करती हैं एवं उन पर स्नेह की वर्षा करती हैं । श्री राधा ही मेरी एक मात्र गति हैं । श्री राधा ऐसी कृपा करें कि उनके श्री चरणों में ही मेरी अनन्य मति बनी रहे ।

