जलको सनेही मीन बिछुरत तजै प्रान - श्री सुंदर जी

जलको सनेही मीन बिछुरत तजै प्रान - श्री सुंदर जी

जलको सनेही मीन बिछुरत तजै प्रान,
मनि बिनु अहि जैसे जीवत न लहिये । [1]
स्वातिबिंदुको सनेही प्रगट जगत माँहि,
एक सीप दूसरो सु चातकहु कहिये ॥ [2]
रविको सनेही पुनि कमल सरोवरमें,
ससिको सनेही हू चकोर जैसे रहिये । [3]
तैसे ही 'सुन्दर' एक प्रभुसौं सनेह जोर,
और कुछ देखि काहू ओर नाहि वहिये ॥ [4]

- श्री सुंदर जी

जैसे मछली पानी के बिना मर जाती है और सांप अपनी मणि से अलग होने पर जीवित नहीं रह सकता । [1]

एक सीप और दूसरे चातक को स्वाति नक्षत्र से गिरने वाली वर्षा-बूंद के प्रेमी के रूप में जग में जाना जाता है । [2]

कमल को सूर्य के प्रेमी के रूप में सरोवर में जाना जाता है और चकोर को चंद्रमा का प्रेमी माना जाता है । [3]

इसी प्रकार श्री सुंदर जी कहते हैं कि तुम भी भगवान से अनन्य प्रेम करो, और तुम्हारा ध्यान कहीं अन्य न भटकने पाए । [4]