सालोक्य-सार्ष्टि-सामीप्य-सारूप्यैकत्वमप्युत ।
दीयमानं न गृह्णन्ति विना मत्सेवनं जनाः।।
- श्रीमद भागवतम् (3.29.13)
भगवान् (श्रीकपिलदेव) कहते हैं - ‘मेरे प्रेमी भक्त, मेरी सेवा को छोड़कर, सालोक्य, सार्ष्टि , सामीप्य, सारूप्य और एकत्व (भगवान् में मिल जाना -ब्रह्मस्वरूप को प्राप्त हो जाना), ये (पाँच प्रकार की दुर्लभ मुक्तियाँ) दिये जाने पर भी नहीं लेते।
दीयमानं न गृह्णन्ति विना मत्सेवनं जनाः।।
- श्रीमद भागवतम् (3.29.13)
भगवान् (श्रीकपिलदेव) कहते हैं - ‘मेरे प्रेमी भक्त, मेरी सेवा को छोड़कर, सालोक्य, सार्ष्टि , सामीप्य, सारूप्य और एकत्व (भगवान् में मिल जाना -ब्रह्मस्वरूप को प्राप्त हो जाना), ये (पाँच प्रकार की दुर्लभ मुक्तियाँ) दिये जाने पर भी नहीं लेते।

