(सवैया)
जयति ललितादि देवीय व्रज श्रुतिरिचा,
कृष्ण प्रिय केलि आधीर अंगी। [1]
जुगल-रस-मत्त आनंदमय रूपनिधि,
सकल सुख समयकी छाँह संगी॥ [2]
गौरमुख हिमकरनकी जु किरनावली,
स्रवत मधु गान हिय पिय तरंगी। [3]
'नागरी’ सकल संकेत आकारिनी,
गनत गुनगननि मति होति पंगी॥ [4]
- श्री नागरी सखी
जय हो ललिता आदि दिव्य सखियों को, जो व्रज की वेद-समान मधुर लीलाओं की धारिणी हैं और श्री राधा-कृष्ण की केलि लीलाओं की अंगीसंगी हैं। [1]
वे सखियाँ युगल-रस में मदमत्त, आनंद से परिपूर्ण और रूप की निधि हैं, जो सभी सुखों की छाया में सदा संगिनी बनी रहती हैं। [2]
उनके गौरवर्ण मुख चंद्रकिरणों की श्रृंखला के समान शोभायमान हैं, और वे मधुर गीतों का रस बहाकर प्रिया-प्रियतम के हृदय में प्रेम की तरंगें जगाती हैं। [3]
श्री ‘नागरी’ सखी कहती हैं – ये सखियाँ सभी संकेतों की सृजनहार, इनके गुणों को गिनने में मेरी बुद्धि तो मानो पंगु हो रही है। [4]
जयति ललितादि देवीय व्रज श्रुतिरिचा,
कृष्ण प्रिय केलि आधीर अंगी। [1]
जुगल-रस-मत्त आनंदमय रूपनिधि,
सकल सुख समयकी छाँह संगी॥ [2]
गौरमुख हिमकरनकी जु किरनावली,
स्रवत मधु गान हिय पिय तरंगी। [3]
'नागरी’ सकल संकेत आकारिनी,
गनत गुनगननि मति होति पंगी॥ [4]
- श्री नागरी सखी
जय हो ललिता आदि दिव्य सखियों को, जो व्रज की वेद-समान मधुर लीलाओं की धारिणी हैं और श्री राधा-कृष्ण की केलि लीलाओं की अंगीसंगी हैं। [1]
वे सखियाँ युगल-रस में मदमत्त, आनंद से परिपूर्ण और रूप की निधि हैं, जो सभी सुखों की छाया में सदा संगिनी बनी रहती हैं। [2]
उनके गौरवर्ण मुख चंद्रकिरणों की श्रृंखला के समान शोभायमान हैं, और वे मधुर गीतों का रस बहाकर प्रिया-प्रियतम के हृदय में प्रेम की तरंगें जगाती हैं। [3]
श्री ‘नागरी’ सखी कहती हैं – ये सखियाँ सभी संकेतों की सृजनहार, इनके गुणों को गिनने में मेरी बुद्धि तो मानो पंगु हो रही है। [4]

