सर्व मर्य्यादयातीत सर्वेशाधिक वैभवे ।
किमशक्यं तवाप्यस्ति नमस्तुभ्यं नमो नमः ॥
- श्री हित कृष्ण चंद्र, श्री राधा उपसुधा निधि (68)
हे वृन्दावनेश्वरी श्रीराधे ! आपका वैभव सर्वेश [श्रीकृष्ण] से भी अधिक है । आप समस्त मर्यादाओं से परे हैं [ अर्थात् लोक-वेद-मर्याएँ आपको छू तक नहीं पातीं अर्थात् आप सर्व-तंत्र-स्वतंत्र हैं। मर्यादाओं के बन्धन में नहीं हैं। ] आपके लिये [ हम जैसों को भी अपना श्रीचरण कैंकर्य प्रदान करना ] क्या असंभव है ? नहीं।
किमशक्यं तवाप्यस्ति नमस्तुभ्यं नमो नमः ॥
- श्री हित कृष्ण चंद्र, श्री राधा उपसुधा निधि (68)
हे वृन्दावनेश्वरी श्रीराधे ! आपका वैभव सर्वेश [श्रीकृष्ण] से भी अधिक है । आप समस्त मर्यादाओं से परे हैं [ अर्थात् लोक-वेद-मर्याएँ आपको छू तक नहीं पातीं अर्थात् आप सर्व-तंत्र-स्वतंत्र हैं। मर्यादाओं के बन्धन में नहीं हैं। ] आपके लिये [ हम जैसों को भी अपना श्रीचरण कैंकर्य प्रदान करना ] क्या असंभव है ? नहीं।

