(राग विहागरौ)
रंगीले दोउ कुंज महल में राजैं ।
करत केलि रस झेली निरंतर किंकिनी नूपुर बाजैं ।। [1]
परिरंभन आलिंगन चुंबन अंग अंग सरस समाजैं ।
सदा समीप रसिक हरिदासी रूप निरखि छबि छाजैं ।। [2]
- श्री रूप सखी, श्री रूप सखी जी की वाणी, श्रृंगार रस के पद (458)
रंगीली दिव्य युगल श्री राधा कृष्ण सदा कुंज महल में विराजते हैं एवं नूपुर की दिव्य धवनि उत्पन्न कर अनवरत केलि रस बरसाते हैं। [1]
यह रसीले दोउ एक दूसरे को प्रगाढ़ आलिंगन एवं चुम्बन प्रदान करते हैं जिनका अंग अंग इस सरस रस से ओतप्रोत होता है । रसिक शिरोमणि अनन्य नृपति ललिता अवतार स्वामी श्री हरिदास जी महाराज सदा इनके अंग संग रहते हैं जिनकी [युगल सरकार] छवी देख देख श्री रूप सखी भी मंत्रमुग्ध हो जाती हैं । [2]
रंगीले दोउ कुंज महल में राजैं ।
करत केलि रस झेली निरंतर किंकिनी नूपुर बाजैं ।। [1]
परिरंभन आलिंगन चुंबन अंग अंग सरस समाजैं ।
सदा समीप रसिक हरिदासी रूप निरखि छबि छाजैं ।। [2]
- श्री रूप सखी, श्री रूप सखी जी की वाणी, श्रृंगार रस के पद (458)
रंगीली दिव्य युगल श्री राधा कृष्ण सदा कुंज महल में विराजते हैं एवं नूपुर की दिव्य धवनि उत्पन्न कर अनवरत केलि रस बरसाते हैं। [1]
यह रसीले दोउ एक दूसरे को प्रगाढ़ आलिंगन एवं चुम्बन प्रदान करते हैं जिनका अंग अंग इस सरस रस से ओतप्रोत होता है । रसिक शिरोमणि अनन्य नृपति ललिता अवतार स्वामी श्री हरिदास जी महाराज सदा इनके अंग संग रहते हैं जिनकी [युगल सरकार] छवी देख देख श्री रूप सखी भी मंत्रमुग्ध हो जाती हैं । [2]

