प्रेम निकेतन श्रीबनहि, आइ गोबर्धन धाम ।
लह्यौ सरन चित चाहिकै, जुगल सरूप ललाम ॥
- श्री रसखान, प्रेम वाटिका (49)
अपने वृन्दावन-वास की घटना की ओर संकेत करते हुए रसखान कहते हैं कि संसार का त्याग कर मैं प्रेम-धाम वृन्दावन में आकर गोवर्धन नामक स्थान में बस गया, जहाँ मैंने सुंदर रूप वाले श्री राधा-कृष्ण की उत्कंठापूर्वक शरण ग्रहण की और उनके युगल-चरणों की भक्ति में तल्लीन हो गया।
लह्यौ सरन चित चाहिकै, जुगल सरूप ललाम ॥
- श्री रसखान, प्रेम वाटिका (49)
अपने वृन्दावन-वास की घटना की ओर संकेत करते हुए रसखान कहते हैं कि संसार का त्याग कर मैं प्रेम-धाम वृन्दावन में आकर गोवर्धन नामक स्थान में बस गया, जहाँ मैंने सुंदर रूप वाले श्री राधा-कृष्ण की उत्कंठापूर्वक शरण ग्रहण की और उनके युगल-चरणों की भक्ति में तल्लीन हो गया।

