रस ही में औ रसिक में, आपुहि कियौ उदोत - श्री रसनिधि जी

रस ही में औ रसिक में, आपुहि कियौ उदोत - श्री रसनिधि जी

रस ही में औ रसिक में, आपुहि कियौ उदोत।
स्वाति-बूँद में आपु ही, आपुहि चातिक होत॥

- श्री रस निधि जी

भगवान ने रस में और रसिक में अपने आप को ही प्रकाशित किया है। स्वाति-बूँद में वही है और उसी को ग्रहण करने वाला चातक भी वही है।