मेरौ मन बाबरौ भयौ - श्री परमानन्द दास, परमानंद सागर (430)

मेरौ मन बाबरौ भयौ - श्री परमानन्द दास, परमानंद सागर (430)

(राग धनाश्री व सारंग)
मेरौ मन बाबरौ भयौ ।
लरका एक इहाँ हुतो ठाड़ो ताही के संग गयो।। [1]
जानों नहीं कोन को ढोटा चित्र विचित्र ठयौ ।
पीतांबर छबि निरख हर्यो मन पढ़ कछु मोहि दयौ ।। [2]
ग्वालिनी एक पाहुनी आई ताकी यह गति कीनी ।
परमानन्द प्रभु हसत सेन दे प्रेम पागि गहि लीनी ।। [3]

- श्री परमानंद दास जी, परमानंद सागर (430)

मेरा मन बांवरा हो गया है । यहाँ एक आकर्षक लड़का खड़ा था, उसके संग ही मेरा मन न जाने कहाँ चला गया । [1]

मुझे नहीं पता कि वह किसका पुत्र था, परंतु उसका अत्यंत मनोरम रूप था। उसे देखते ही उसके पीले वस्त्रों ने ही मेरा मन चुरा लिया। [2]

इस प्रकार वह गवालिनी जिसने उस लड़के को पहली बार देखा था उसकी यह गति हुई । श्री परमानंद दास के प्रभु श्याम सुंदर पुनः हँसे और उस गवालिनी से मिलने के लिए उसे संकेत दिया और उन्होंने उसे प्रेम से गले लगा लिया ।  [3]