किशोरी मोहे कब कहोगी मेरी ।
कब हंस चहौं कहौ कछु सेवा,
कब कहवाऊँ तेरी ॥ [1]
कब वृन्दाबन कुंजलता द्रुम
कब रहौ इकटक हेरी।
प्रेमसखी कह कह कब टेरो,
कृष्ण अली की चेरी ॥ [2]
- श्री प्रेमदासजी [श्री लाल बलबीर जी के भ्राता]
किशोरी जी मुझे कब आप अपना कहोगी । कब आप मुझपर प्रसन्न होकर अपनी कुछ सेवा कहोगी; कब मैं तुम्हारी कहलाऊँगी । [1]
कब मैं वृंदावन के वृक्षों की कुंजलताओं में तुम्हारे दर्शन कर तुमको इकतक निहारती रह जाऊँगी । श्री प्रेमदासजी कहते हैं कि मैं तो अपने गुरु कृष्ण अलि की चेरी हूँ, कब आप मुझे प्रेम सखी कह कह कर बुलाएँगी ? [2]
कब हंस चहौं कहौ कछु सेवा,
कब कहवाऊँ तेरी ॥ [1]
कब वृन्दाबन कुंजलता द्रुम
कब रहौ इकटक हेरी।
प्रेमसखी कह कह कब टेरो,
कृष्ण अली की चेरी ॥ [2]
- श्री प्रेमदासजी [श्री लाल बलबीर जी के भ्राता]
किशोरी जी मुझे कब आप अपना कहोगी । कब आप मुझपर प्रसन्न होकर अपनी कुछ सेवा कहोगी; कब मैं तुम्हारी कहलाऊँगी । [1]
कब मैं वृंदावन के वृक्षों की कुंजलताओं में तुम्हारे दर्शन कर तुमको इकतक निहारती रह जाऊँगी । श्री प्रेमदासजी कहते हैं कि मैं तो अपने गुरु कृष्ण अलि की चेरी हूँ, कब आप मुझे प्रेम सखी कह कह कर बुलाएँगी ? [2]

