राधा-पदाम्बुजादन्यत् स्वप्नेऽपि - श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (8.35)

राधा-पदाम्बुजादन्यत् स्वप्नेऽपि - श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (8.35)

राधा-पदाम्बुजादन्यत् स्वप्नेऽपि च न जानतीम्।
राधा-सम्बन्धसंधावत् प्रेमसिन्धौघशालिनीम् ।।

- श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (8.35)

श्रीराधा के चरण कमल के अतिरिक्त स्वप्न में भी श्री राधा दासी और कुछ नहीं जानती । वह श्रीराधा के दिव्य प्रेम की तरंगों में सदा प्रवाहित हो रही है।