श्याम श्याम रटते रहौ, निसिदिन आठों याम ।
उनकी पद रज सिर धरौं, नहिं ब्रह्म सों काम ॥
- श्री वल्लभ दास (पुष्टिमार्गी भक्त)
मैं दिन-रात, आठों याम “श्याम-श्याम” नाम का जप करता रहूँ और उनके चरणों की रज को अपने मस्तक पर धारण करूँ। मुझे उस निराकार ब्रह्म से कोई प्रयोजन नहीं है।
उनकी पद रज सिर धरौं, नहिं ब्रह्म सों काम ॥
- श्री वल्लभ दास (पुष्टिमार्गी भक्त)
मैं दिन-रात, आठों याम “श्याम-श्याम” नाम का जप करता रहूँ और उनके चरणों की रज को अपने मस्तक पर धारण करूँ। मुझे उस निराकार ब्रह्म से कोई प्रयोजन नहीं है।

