काहू तप-दान-मद, काहू धन-मान-मद - श्री कान्त किशोर

काहू तप-दान-मद, काहू धन-मान-मद - श्री कान्त किशोर

काहू तप-दान-मद, काहू धन-मान-मद,
काहू गुन-ज्ञयान-मद, काहु मद बात कौ। [1]
काहू रंग-रूप-मद, काहू भए भूप-मद,
काहू कौं चढ़यौ है मद सुघर सु-गात कौ॥ [2]
काहू तन-बल-मद, काहू छद्म-छल-मद,
काहू कौं कुटुम्ब-मद, जन पाँच सात कौ। [3]
हौंय रद सब मद, ‘कान्त’ जब चढ़ मद,
​​कामिनी किसोरी के, चरन-जलजात कौ॥ [4]

- श्री कान्त किशोर

किसी को तप और दान का अभिमान है, किसी को धन, मान और प्रतिष्ठा का गर्व है; किसी को अपने गुण और ज्ञान पर अहंकार है, तो किसी को अपनी बातों पर ही गर्व है। [1]

किसी को अपने रंग-रूप का मद है, किसी को अपने राज-पद का अहंकार है, और किसी को अपने सुंदर गायन या संगीत पर गर्व है। [2]

किसी को अपने तन-बल का अभिमान है, किसी को अपने कपटी स्वभाव का गर्व है, और कुछ जनों को अपने कुटुंब और घर पर अहंकार है। [3]

श्री कान्त किशोर कहते हैं कि "इन सब अभिमानों का अंत हो जाता है यदि श्री किशोरी जी राधा के चरण कमलों का मद (नशा) चढ़ जाए।" [4]