रूप-रसीली हँसीली छबीली रँगीली,
रँगीले के प्रान ते प्यारी । [1]
सुलज्ज सुरंग सुनैन बिसालनि,
सोभित अंजन रेख अनियारी ।। [2]
महामृदु बोलनि मोती की डोलनि,
मोल लिये ध्रुव कुंज-बिहारी । [3]
रहे सुख पाइ न और सुहाइ,
भये बस नेह के देह बिसारी ।। [4]
- श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, श्रृंगार शत, प्रथम श्रृंखला (36)
सरस रूपमयी मन्द-स्मिता छबि आगरी एवं रंग रंगीली प्रिया रसिक रँगीले लाल को अपने प्राणों से भी अधिक प्यारी हैं । [1]
उनके सुन्दर, लजीले, रतनारे, विशाल नयनों में झीनी अञ्जन रेखा सुशोभित हो रही है । [2]
श्री ध्रुवदास जी कहते हैं कि उनकी महा मृदु मधुर वाणी एवं नासा मुक्ता की लोल गति ने कञ्जविहारी प्रियतम को सदैव के लिये अपना वशवर्ती बना लिया है । [3]
श्री लाल ने भी ऐसा अभूतपूर्व सुख प्राप्त किया है कि अब उन्हें इसके सिवाय अन्य कुछ प्रिय लगता ही नहीं। वे देह की सुधि-बुधि को भूल कर केवल एक प्रेम-किंकर बन गये हैं । [4]
रँगीले के प्रान ते प्यारी । [1]
सुलज्ज सुरंग सुनैन बिसालनि,
सोभित अंजन रेख अनियारी ।। [2]
महामृदु बोलनि मोती की डोलनि,
मोल लिये ध्रुव कुंज-बिहारी । [3]
रहे सुख पाइ न और सुहाइ,
भये बस नेह के देह बिसारी ।। [4]
- श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, श्रृंगार शत, प्रथम श्रृंखला (36)
सरस रूपमयी मन्द-स्मिता छबि आगरी एवं रंग रंगीली प्रिया रसिक रँगीले लाल को अपने प्राणों से भी अधिक प्यारी हैं । [1]
उनके सुन्दर, लजीले, रतनारे, विशाल नयनों में झीनी अञ्जन रेखा सुशोभित हो रही है । [2]
श्री ध्रुवदास जी कहते हैं कि उनकी महा मृदु मधुर वाणी एवं नासा मुक्ता की लोल गति ने कञ्जविहारी प्रियतम को सदैव के लिये अपना वशवर्ती बना लिया है । [3]
श्री लाल ने भी ऐसा अभूतपूर्व सुख प्राप्त किया है कि अब उन्हें इसके सिवाय अन्य कुछ प्रिय लगता ही नहीं। वे देह की सुधि-बुधि को भूल कर केवल एक प्रेम-किंकर बन गये हैं । [4]

