मुक्ति रहति द्वारें खरी, आज्ञा बस करज़ोर,
किंकर के किंकर सोऊ, चितवत नहिं दृग कोर॥
- श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह जी), श्री नागरीदास जी की वाणी, उत्सव माला (14.3)
बरसाना धाम की जय हो, जहाँ मुक्ति भी साक्षात् द्वार पर कुछ सेवा प्राप्त करने के लिए हाथ जोड़कर खड़ी रहती है, और जहाँ दासी की दासी भी उस मुक्ति की ओर दृष्टि नहीं उठाती।
किंकर के किंकर सोऊ, चितवत नहिं दृग कोर॥
- श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह जी), श्री नागरीदास जी की वाणी, उत्सव माला (14.3)
बरसाना धाम की जय हो, जहाँ मुक्ति भी साक्षात् द्वार पर कुछ सेवा प्राप्त करने के लिए हाथ जोड़कर खड़ी रहती है, और जहाँ दासी की दासी भी उस मुक्ति की ओर दृष्टि नहीं उठाती।

