(सवैया)
कौन करै तप तर्पन तीरथ, तीन प्रकार कहाँ मन लाऊँ। [1]
कौन करै व्रत संजम नेम, सुप्रेम पुनीत प्रसादहि पाऊँ॥ [2]
कुंजनि वास निवास रसिक, श्रीनागरीदास विलास बढाऊँ। [3]
चित्त लगाय उभे पद अंबुज, नित्यबिहारीबिहारिन गाऊँ॥ [4]
- श्री नागरीदेव जी, श्री नागरीदेव जु की वाणी, सिद्धांत के पद (31)
एक नित्यविहार का अनन्य रसोपासक कहता है कि अब ऐसी अद्भुत रसोपासना के अतिरिक्त कौन तीन प्रकार के साधन—तप, तर्पण और तीर्थ-भ्रमण आदि में मन लगाए? [1]
इसी प्रकार कौन अब व्रत, संयम, नेम आदि करे? मैं तो सदा काल प्रेम-प्रसाद ही पाऊँगा। [2]
मैं तो श्री वृन्दावन के लता-कुंजों में वास कर, रसिकों के समीप रहकर श्री युगल के विलास को ही सतत बढ़ाऊँगा। [3]
श्री नागरीदास जी कहते हैं कि अब मैं नित्य निरंतर श्री बिहारी-बिहारिणीजू के चरण-कमलों में चित्त लगाकर उनके गुणों का ही गान करूँगा। [4
कौन करै तप तर्पन तीरथ, तीन प्रकार कहाँ मन लाऊँ। [1]
कौन करै व्रत संजम नेम, सुप्रेम पुनीत प्रसादहि पाऊँ॥ [2]
कुंजनि वास निवास रसिक, श्रीनागरीदास विलास बढाऊँ। [3]
चित्त लगाय उभे पद अंबुज, नित्यबिहारीबिहारिन गाऊँ॥ [4]
- श्री नागरीदेव जी, श्री नागरीदेव जु की वाणी, सिद्धांत के पद (31)
एक नित्यविहार का अनन्य रसोपासक कहता है कि अब ऐसी अद्भुत रसोपासना के अतिरिक्त कौन तीन प्रकार के साधन—तप, तर्पण और तीर्थ-भ्रमण आदि में मन लगाए? [1]
इसी प्रकार कौन अब व्रत, संयम, नेम आदि करे? मैं तो सदा काल प्रेम-प्रसाद ही पाऊँगा। [2]
मैं तो श्री वृन्दावन के लता-कुंजों में वास कर, रसिकों के समीप रहकर श्री युगल के विलास को ही सतत बढ़ाऊँगा। [3]
श्री नागरीदास जी कहते हैं कि अब मैं नित्य निरंतर श्री बिहारी-बिहारिणीजू के चरण-कमलों में चित्त लगाकर उनके गुणों का ही गान करूँगा। [4

