व्यास जगत में रसिक जन, जैसें द्रुम पर चंद - श्री हरिराम व्यास - व्यास वाणी, साखी (142)

व्यास जगत में रसिक जन, जैसें द्रुम पर चंद - श्री हरिराम व्यास - व्यास वाणी, साखी (142)

व्यास जगत में रसिक जन, जैसें द्रुम पर चंद ।
सतचित अरु आनंदमय, भेद न जानत मंद ।।

- श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, सिद्धांत की साखी (142)

श्री हरिराम व्यास कहते हैं कि इस संसार में रसिक संत ठीक उसी प्रकार सुशोभित होते हैं, जैसे वृक्षों के ऊपर चंद्रमा अपनी शीतलता बिखेरता है। वास्तव में चंद्रमा शाखाओं पर नहीं होता, उसी प्रकार रसिक साक्षात् सत्-चित्-आनंद के स्वरूप होते हैं। किंतु मंदमति लोग उनके इस अलौकिक रहस्य को नहीं समझ पाते और उन्हें अपने जैसा ही मान लेते हैं।