राधे सुख को सार, निरखत पिय गोहन रहैं ।
हिय बिच किएँ जुहार, अष्ट पहर तुमकों चहैं ॥
- श्री ब्रजनिधि जी, ब्रजनिधि ग्रंथावली, प्रीति लता (28)
हे श्री राधे! आप ही समस्त सुखों का सार और आधार हैं। आपके इसी सुखद रूप का दर्शन करने के लिए प्रियतम श्री कृष्ण निरंतर आपके पीछे-पीछे (संग-संग) लगे रहते हैं। वे अपने हृदय के भीतर ही आपको बारंबार प्रणाम (जुहार) करते हैं और आठों पहर केवल आपकी ही चाहना करते हैं।
हिय बिच किएँ जुहार, अष्ट पहर तुमकों चहैं ॥
- श्री ब्रजनिधि जी, ब्रजनिधि ग्रंथावली, प्रीति लता (28)
हे श्री राधे! आप ही समस्त सुखों का सार और आधार हैं। आपके इसी सुखद रूप का दर्शन करने के लिए प्रियतम श्री कृष्ण निरंतर आपके पीछे-पीछे (संग-संग) लगे रहते हैं। वे अपने हृदय के भीतर ही आपको बारंबार प्रणाम (जुहार) करते हैं और आठों पहर केवल आपकी ही चाहना करते हैं।

