करुनानिधि नागरि अहो - श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावानी, सहज सुख (74)

करुनानिधि नागरि अहो - श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावानी, सहज सुख (74)

(दोहा)
करुनानिधि नागरि अहो, करुना करहु जु सोइ ।
यह कैं ऊ वह कै जु वा, रहौं चरन तर होई ॥


(पद)
ऐसी करौ करुनानिधि नागरि होइ रहों कछु तिहारे चरन तर ।
यह कैं ऊ वह कै वा ओही इतने में कोई पाऊँ बर ॥
मन बच क्रम निहचै उर मेरे और कछु अभिलाष न अतपर ।
श्रीहरिप्रिया धन्य पन जानौं मन मानौं मम भाग सु फरकर ॥

- श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावाणि, सहज सुख (74)

प्यारीजू [श्री राधा] के चरण सहलाते हुए ज्यों ही लालजी [श्री कृष्ण] की दृष्टि उपरोक्त इन 19 चरणारविन्दों के तलवों के चिह्नों पर पड़ी, त्यों ही वे अधीर होकर कहने लगे:

(दोहा)
हे करुणानिधि नागरीजू [राधारानी], आप मुझ पर ऐसी करुणा करो जिससे कि मैं आपके तलवों के चरण-चिह्नों में से कोई एक हो जाऊँ। इनमें भी मैं निश्चय नहीं कर पाता कि कौन सा चिह्न बनूँ।

(पद)
हे करुणानिधि नागरी जू, आप मुझ पर ऐसी कृपा करें जिससे कि मैं आपके चरणों के तलवों के चिह्नों में से कोई एक हो जाऊँ। मन वचन कर्म से मेरे हृदय में यही दृढ़ निश्चय है, इसके अतिरिक्त मेरी और कोई अभिलाषा नहीं है (चरण-चिह्नों पर ऊँगली रख रख कर उन्मत्त से होकर लाल कह रहे हैं) इस चिह्न को बनने को कहूं या उस चिह्न को बनने के लिए कहूं, नहीं नहीं पहले वाले को ही बनने के लिए कहूँ। ऐसा कहते समय ही प्यारी जू अमुक चरण चिह्न बनने के लिए आज्ञा प्रदान करें। हे श्रीहरि प्रिया सखी, ऐसा होने से ही मैं अपने आप को धन्य जानूं और यह समझूँ कि मुझको मन माना वर मिल गया और मेरे भाग्य सुफल फले ।