भानुनन्दनी सदा वन्दनी चन्द चन्दनी - श्री गोपाल दास, निकुंज रस वल्लरी (129)

भानुनन्दनी सदा वन्दनी चन्द चन्दनी - श्री गोपाल दास, निकुंज रस वल्लरी (129)

भानुनन्दनी सदा वन्दनी चन्द चन्दनी,
अब तो प्रिया हमारी हैं। [1]
प्रिय फन्दिनी गज गयन्दिनी सुखद रंजनी,
जीवन की रखवारी हैं॥ [2]
व्रज ठकुरानी श्रीवनरानी नव गुण खानी,
रसिकन हिये विचारी हैं। [3]
हित की बानी पिय मनमानी शोभा सनमानी,
हितगोपाल बलिहारी हैं॥ [4]

- श्री हित गोपाल दास [सेवा कुञ्ज वाले], निकुंज रस वल्लरी (129)

श्री राधा जू वृषभानु जी की नंदिनी हैं, जो सदा वंदित हैं, और चंद्रमा की चाँदनी के समान उज्ज्वल हैं। अब तो श्री प्रिया जी सदा-सदा के लिए हमारी ही हैं। [1]

श्री राधा, जो भगवान श्री कृष्ण को अपने प्रेम के बंधन में नित्य बांधने वाली हैं, जिनकी चाल मदमस्त हाथी के समान मोहक है, जो सुखदायिनी एवं मन को मोहित करने वाली हैं—वे ही मेरे जीवन की रक्षक हैं। [2]

श्री राधा, जो ब्रज की ठकुरानी हैं, वृंदावन की रानी हैं, और जो सदा नवीन गुणों की खान हैं, वे ही रसिकों के हृदय में सदैव चिन्तन का विषय हैं। [3]

श्री राधा, जिनकी वाणी प्रेम से परिपूर्ण है, जो पिय से सदा अपनी मनमानी करती हैं, जिनकी शोभा अद्वितीय है—श्री हित गोपाल दास कहते हैं कि ऐसी श्री राधिका पर सर्वस्व बलिहारी है। [4]