माला जनेऊ घालि गरै, दुरै न साकत सूद ।
वृति कृति तें जानियैं, डौंम क़ौम दाऊद ।।
- श्री बिहारिन देव - बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धान्त की साखी (190)
कुछ लोग गले में कंठी और जनेऊ धारण कर अपने को उच्च कुल का बताकर परिचय देते हैं, किंतु उनकी वृत्ति और कृत्य से ही स्पष्ट हो जाता है कि वे वास्तव में किस कुल और जाति के हैं। मनुष्य की वास्तविक पहचान उसकी वृत्ति और आचरण से ही होती है। भाव यह है कि अंतःकरण की शुद्धता से ही जीव का स्वरूप प्रकट होता है, और भक्ति में जाति तथा कुल का अहंकार बाधक होता है।
वृति कृति तें जानियैं, डौंम क़ौम दाऊद ।।
- श्री बिहारिन देव - बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धान्त की साखी (190)
कुछ लोग गले में कंठी और जनेऊ धारण कर अपने को उच्च कुल का बताकर परिचय देते हैं, किंतु उनकी वृत्ति और कृत्य से ही स्पष्ट हो जाता है कि वे वास्तव में किस कुल और जाति के हैं। मनुष्य की वास्तविक पहचान उसकी वृत्ति और आचरण से ही होती है। भाव यह है कि अंतःकरण की शुद्धता से ही जीव का स्वरूप प्रकट होता है, और भक्ति में जाति तथा कुल का अहंकार बाधक होता है।

