हमारे मन भाईं भानुलली- प्रेम रस मदिरा, सिद्धांत माधुरी (133)

हमारे मन भाईं भानुलली- प्रेम रस मदिरा, सिद्धांत माधुरी (133)

हमारे मन भाईं भानुलली।
भरी गुमान दिवानी डोलति, जानत जग पगली ।। [1]
लोक वेद कुल कानि तजी सब, लोग कहेँ विटली।
कर्म अकर्म विकर्म आदि की, विपदा आपु टली ।। [2]
राधे नाम सरस रस चाखत, अमृत मधुर डली ।
विहरति नित ‘कृपालु’ स्वामिनि सँग, गहवर कुंजगली ।। [3]

-जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, प्रेम रस मदिरा, सिद्धांत माधुरी (133)
 
मेरे मन को श्री वृषभानुनंदिनी किशोरी जी ही अच्छी लगती है।‘वे हमारी स्वामिनी हैं’ मैं इसी अभिमान में सदा दिवानी रहती हूँ। संसार मुझे पगली समझता है। [1]

मैंने लोक, वेद एवं वंश की मर्यादा का सर्वथा त्याग कर दिया है। संसार के लोग भ्रष्ट कहते हैं। कर्म,अकर्म (कर्म न करना),विकर्म (विपरीत कर्म करना), इत्यादि की आपति अपने–आप ही समाप्त हो गई। [2]

अमृत से भी मीठे राधे नाम के रस को मैं सदा ही पिया करती हूँ।‘श्री कृपालु जी’ के शब्दों में, मैं निरन्तर ही स्वामिनी जी के साथ गहवर वन की कुंज गलियों में विविध प्रकार के रसविलास का रसास्वादन किया करती हूँ। [3]