(कवित्त)
अंग पर चीथरा हाथ में षीपरा,
फिरों वन-वन भ्रमत आस मेरी। [1]
फूल-फल-पात झर पर जो सहज ही,
भूष की दाह में पाऊँ जेरी॥ [2]
रूप बन नैन-उर छाई रहे रैनि दिन,
निपट उन्मत्त हवै चित्त एरी। [3]
आनन्द को चंद सुष-कंद पिय लाल करो,
‘अलबेली’ कब होइ सौं दृष्टि मेरी॥ [4]
- श्री अलबेली अलि, वृंदावनसत (25)
अंगों पर फटे-पुराने वस्त्र, हाथों में खीपरा लिए, मैं एकमात्र आशा लेकर ब्रज के वन-वन में भ्रमण करूँ। [1]
जो भी सहजता से (बिना प्रयास के) फल, फूल और पत्ते झड़ते हैं, उन्हीं को पाकर अपनी शारीरिक भूख शांत करूँ। [2]
रात-दिन मेरी आँखों के सम्मुख दिव्य युगल श्री प्रिया-लाल का सलोना रूप छाया रहे, और मेरा मन उनकी रूप-माधुरी का पान कर उन्मत्त बना रहे। [3]
हे आनंद के कंद, सुख के सागर श्री लाल जी! ऐसी कृपा करें कि श्री अलबेली सरकार (श्री राधा) की कृपादृष्टि मेरी ओर पड़े। [4]
अंग पर चीथरा हाथ में षीपरा,
फिरों वन-वन भ्रमत आस मेरी। [1]
फूल-फल-पात झर पर जो सहज ही,
भूष की दाह में पाऊँ जेरी॥ [2]
रूप बन नैन-उर छाई रहे रैनि दिन,
निपट उन्मत्त हवै चित्त एरी। [3]
आनन्द को चंद सुष-कंद पिय लाल करो,
‘अलबेली’ कब होइ सौं दृष्टि मेरी॥ [4]
- श्री अलबेली अलि, वृंदावनसत (25)
अंगों पर फटे-पुराने वस्त्र, हाथों में खीपरा लिए, मैं एकमात्र आशा लेकर ब्रज के वन-वन में भ्रमण करूँ। [1]
जो भी सहजता से (बिना प्रयास के) फल, फूल और पत्ते झड़ते हैं, उन्हीं को पाकर अपनी शारीरिक भूख शांत करूँ। [2]
रात-दिन मेरी आँखों के सम्मुख दिव्य युगल श्री प्रिया-लाल का सलोना रूप छाया रहे, और मेरा मन उनकी रूप-माधुरी का पान कर उन्मत्त बना रहे। [3]
हे आनंद के कंद, सुख के सागर श्री लाल जी! ऐसी कृपा करें कि श्री अलबेली सरकार (श्री राधा) की कृपादृष्टि मेरी ओर पड़े। [4]

