रतनारी हो थारी आँखड़ियाँ।
प्रेम छकी रसबस अलसाड़ी,
जाणे कमलकी पाँखड़ियाँ ॥ [1]
सुंदर रूप लुभाई गति मति,
हौं गईं ज्यूँ मधु माँखड़ियाँ ।
रसिक बिहारी वारी प्यारी,
कौन बसी निसि काँखड़ियाँ ॥ [2]
- श्री बनी ठनी जी
श्री प्यारी जू [श्री राधा] की अँखियाँ रतनारी हैं जो प्रेम रस में छकी एवं अलसा रही हैं मानो कमल की पंखड़ी के समान हैं । [1]
जिनका सुंदर रूप देख कर मेरी मति मानो मधुमखियों की भाँति लुभायमान हो रही हैं । श्री बनी ठनी जी कहती हैं कि मैं तो प्यारी जू पर वारी वारी जाऊँ, रात्री में इनके संग, कौन बसा था? [2]
प्रेम छकी रसबस अलसाड़ी,
जाणे कमलकी पाँखड़ियाँ ॥ [1]
सुंदर रूप लुभाई गति मति,
हौं गईं ज्यूँ मधु माँखड़ियाँ ।
रसिक बिहारी वारी प्यारी,
कौन बसी निसि काँखड़ियाँ ॥ [2]
- श्री बनी ठनी जी
श्री प्यारी जू [श्री राधा] की अँखियाँ रतनारी हैं जो प्रेम रस में छकी एवं अलसा रही हैं मानो कमल की पंखड़ी के समान हैं । [1]
जिनका सुंदर रूप देख कर मेरी मति मानो मधुमखियों की भाँति लुभायमान हो रही हैं । श्री बनी ठनी जी कहती हैं कि मैं तो प्यारी जू पर वारी वारी जाऊँ, रात्री में इनके संग, कौन बसा था? [2]

