प्रत्यङ्गोच्छलदुज्ज्वलामृत रस प्रेमैक पूर्णाम्बुधि र्लावण्यैक सुधानिधिः पुरु कृपा वात्सल्य साराम्बुधिः ।
तारुण्य-प्रथम-प्रवेश विलसन्माधुय्र्य साम्राज्य भूर्गुप्तः कोपि महानिधिर्विजयते राधा रसैकावधिः ।।
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (135)
प्रेम का एक अनुपम परिपूर्णतम सागर है। जिसके अङ्ग-प्रत्यङ्गों से नित्य-प्रति उज्ज्वल अमृत-रस उच्छलित होता रहता है । वह (प्रेममहानिधि ) लावण्य का भी अनुपम समुद्र है और अत्यधिक कृपामय वात्सल्य-सार का भी अम्बुधि है । वह तारुण्य के प्रथम-प्रवेश से विलसित माधुर्य-साम्राज्य की भूमि है, और रस की एकमात्र सीमा है । वही ‘राधा’ नामक कोई परम-गुप्त महानिधि सर्वोत्कर्ष-पूर्वक विराजमान है।
तारुण्य-प्रथम-प्रवेश विलसन्माधुय्र्य साम्राज्य भूर्गुप्तः कोपि महानिधिर्विजयते राधा रसैकावधिः ।।
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (135)
प्रेम का एक अनुपम परिपूर्णतम सागर है। जिसके अङ्ग-प्रत्यङ्गों से नित्य-प्रति उज्ज्वल अमृत-रस उच्छलित होता रहता है । वह (प्रेममहानिधि ) लावण्य का भी अनुपम समुद्र है और अत्यधिक कृपामय वात्सल्य-सार का भी अम्बुधि है । वह तारुण्य के प्रथम-प्रवेश से विलसित माधुर्य-साम्राज्य की भूमि है, और रस की एकमात्र सीमा है । वही ‘राधा’ नामक कोई परम-गुप्त महानिधि सर्वोत्कर्ष-पूर्वक विराजमान है।

