हमारी श्री राधा महारानी - श्री भारतेंदु हरिशचंद्र, भारतेंदु ग्रंथावली, वर्षा विनोद (35)

हमारी श्री राधा महारानी - श्री भारतेंदु हरिशचंद्र, भारतेंदु ग्रंथावली, वर्षा विनोद (35)

हमारी श्री राधा महारानी ।
तीन लोक को ठाकुर जो है ताहू की ठकुरानी ।। [1]
सब ब्रज की सिरताज लाड़िली सखियन की सुखदानी ।
'हरीचन्द' स्वामिनि पिय कामिनि परम कृपा की खानी ।। [2]

- श्री भारतेंदु हरिशचंद्र, भारतेंदु ग्रंथावली, वर्षा विनोद (35)

हमारी श्री राधा महारानी तीनों लोकों के ठाकुर की भी ठकुरानी हैं ।  [1]

समस्त ब्रज की सिरताज अन्य कोई नहीं हमारी श्री लाड़िली जी हैं जो सखियों को नित्य ही सुख प्रदान करती हैं। श्री हरिचंद की स्वामिनी राधिका पिय श्री श्यामसुंदर की प्रेयसी हैं एवं परम कृपा की खानी हैं । [2]