नव निकुंज नव भूमि रगमगी - श्री विट्ठल विपुल देव जू की बानी (36)

नव निकुंज नव भूमि रगमगी - श्री विट्ठल विपुल देव जू की बानी (36)

(राग केदारौ)
नव निकुंज नव भूमि रगमगी ।
नवल बिहारीलाल लाडिलौ नवल सरद की जोन्ह जगमगी ।। [1]
नव सत साजि सकल अंग सुंदरि नवल बदन पर अलक सगबगी ।
श्री बीठलबिपुल बिहारी के अंग लाडति लाडिली सहज उर लगी ।। [2]

- श्री विठ्ठल विपुल देव जी, श्री विट्ठल विपुल देव जू की बानी (36)

नवनवायमान छटा से सुशोभित निकुंजमहल एवं नव-नव शोभा की वृद्धि करती हुई श्रीवन-भूमि नव-नव प्रेम रंग से अभिभूत है। नव-नव सौन्दर्य-माधुरी से संयुक्त लाडिले श्रीबिहारीलाल शरदकालीन रात्रि की आभा से अभिमण्डित हो रहे हैं । [1] 

श्री लाडिली जी [राधिका] सुषमा का विकास कर रही है मानो नव-सत [अर्थात् सोलहों] शृंगार से वे सुसज्जित हो रही हों । उनके बदनारविन्द पर अलकावलि बिखर रही है। अपने प्रियतम लाल बिहारी के संग विपुल बिहार के मैदान में वे उनके हृदय से आश्लेषित होकर प्रेम-रंग में रत हैं । [2]