(राग बसंत)
देखोऊ प्यारी कुंजबिहारी मूरति बंत बसंत ।
मोरी तरुण तरुलता तनमै मनसिज रस वरसंत ।। [1]
अरुण अधर नव पल्लव शोभा विहसनि कुसुम विकाश ।
फूले बिमल कमल से लोचन सूचित मनको हुलास ।। [2]
चल चूर्ण कुन्तल अलिभाला मुरली कोकिल नाद ।
देखीयति गोपीजन बनराई मुदित मदन उनमाद ।। [3]
सहज सुवास स्वास मलयानिल लागत सदानि सुहायौ ।
श्री राधामाधवी गदाधर प्रभु परसत सुखपायौ ।। [4]
- श्री गदाधर भट्ट, श्री गदाधर भट्ट जी की वाणी (57)
हे सखी, बसंत के इस मौसम में श्री कुंजबिहारी को मूर्ति की भाँति अर्थात् अहर्निश निहार। उनके तरुण एवं नित्य नवीन तन से रस की वर्षा हो रही है। [1]
श्री श्याम सुंदर के लाल अधर मानों ऐसे हैं जैसे सुबह सुबह के प्रकाश से खिले हुए फूल हों । उनकी आँखें ऐसी हैं मानो खिले हुए कमल हों जो मन के हुल्लास को बढ़ाने का संकेत दे रहे हों । [2]
श्री श्यामसुंदर की बिखरी अलकें फूलों की माला की तरह लगती हैं, एवं उनकी बांसुरी की धवनि कोयल के समान है। गोपियां उनकी छटा को देखकर वृक्षों के समूहों की तरह निहार कर आनंदित हो रही हैं; कामदेव भी मंत्रमुग्ध हो गया है। [3]
सहज ही सुगंधित मलाया पर्वतों से आने वाली चंदन युक्त समीर के धीरे धीरे चलने से यह स्थान सदा से ही सुहावना लगता है एवं सब के हृदय को भाता है । श्री गदाधर भट्ट जी प्रसन्न होकर अपने प्रभु दिव्य दम्पति श्री राधा माधव के चरणों का स्पर्श प्राप्त करते हैं । [4]
देखोऊ प्यारी कुंजबिहारी मूरति बंत बसंत ।
मोरी तरुण तरुलता तनमै मनसिज रस वरसंत ।। [1]
अरुण अधर नव पल्लव शोभा विहसनि कुसुम विकाश ।
फूले बिमल कमल से लोचन सूचित मनको हुलास ।। [2]
चल चूर्ण कुन्तल अलिभाला मुरली कोकिल नाद ।
देखीयति गोपीजन बनराई मुदित मदन उनमाद ।। [3]
सहज सुवास स्वास मलयानिल लागत सदानि सुहायौ ।
श्री राधामाधवी गदाधर प्रभु परसत सुखपायौ ।। [4]
- श्री गदाधर भट्ट, श्री गदाधर भट्ट जी की वाणी (57)
हे सखी, बसंत के इस मौसम में श्री कुंजबिहारी को मूर्ति की भाँति अर्थात् अहर्निश निहार। उनके तरुण एवं नित्य नवीन तन से रस की वर्षा हो रही है। [1]
श्री श्याम सुंदर के लाल अधर मानों ऐसे हैं जैसे सुबह सुबह के प्रकाश से खिले हुए फूल हों । उनकी आँखें ऐसी हैं मानो खिले हुए कमल हों जो मन के हुल्लास को बढ़ाने का संकेत दे रहे हों । [2]
श्री श्यामसुंदर की बिखरी अलकें फूलों की माला की तरह लगती हैं, एवं उनकी बांसुरी की धवनि कोयल के समान है। गोपियां उनकी छटा को देखकर वृक्षों के समूहों की तरह निहार कर आनंदित हो रही हैं; कामदेव भी मंत्रमुग्ध हो गया है। [3]
सहज ही सुगंधित मलाया पर्वतों से आने वाली चंदन युक्त समीर के धीरे धीरे चलने से यह स्थान सदा से ही सुहावना लगता है एवं सब के हृदय को भाता है । श्री गदाधर भट्ट जी प्रसन्न होकर अपने प्रभु दिव्य दम्पति श्री राधा माधव के चरणों का स्पर्श प्राप्त करते हैं । [4]

