आवति आनंद कंद दुलारी - श्री परमानन्द दास, परमानंद सागर (825)

आवति आनंद कंद दुलारी - श्री परमानन्द दास, परमानंद सागर (825)

(राग सारंग)
आवति आनंद कंद दुलारी ।
विधु बदनी मृग नयनी राधा दामोदर की प्यारी ॥ [1]
जाके रूप कहत नहिं आवैं गुन विचित्र सुकुमारी ।
मानो कछू पर्यौ धन आखरि विधना रच्यो संवारी ॥ [2]
प्रीति परस्पर ग्रंथि न छूटे ब्रजजन रहे बिचारी ।
परमानंददास बलिहारी मानो साँचे ढारी ॥ [3]

- श्री परमानन्द दास, परमानंद सागर (825)

आनंदकंद दुलारी श्री राधिका आ रही हैं जिनका बदन चंद्रमा के समान है, जिनके नयन मृग समान हैं एवं जो दामोदर [श्री कृष्ण] की प्यारी हैं । [1]

श्री राधिका सुकुमारी, जिनका रूप कहने में नहीं आ रहा, जो दिव्य विचित्र गुणों की खान हैं । ऐसा लगता है मानो विधाता ने इन्हें अंतिम परम धन के रूप में संवारा है । [2]

जिनकी प्रीति की ग्रंथी अद्बुत है एवं ब्रजवासियों को जिनका सदा विचार रहता है  (अथवा श्री राधिका को ब्रज के जनों का सदा विचार रहता है) । श्री परमानंद दास जी कहते हैं ऐसी निपुण एवं सर्वोकृष्ट स्वामिनी पर बलिहारी है । [3]