(कवित्त)
वन्दत है तीनों लोक, आनंद अपार मान,
वन्दे वन्दनीय शेष, धरणी के धरन हैं। [1]
वन्दे नित चन्द्र चूड़, हिमगिर में वास करें,
ब्रह्मा जी वन्दें, सब सृष्टि के करन हैं॥ [2]
वन्दे हनुमान, आन मानें जग जाकी आज,
वन्दे ब्रज वासी, स्वर्गवासी हू शरन हैं। [3]
सेवैं हरिदास रूप राशि में 'छबीले' रम्य,
भक्त मन भावते बिहारी के चरण हैं॥ [4]
- श्री छबीले वल्लभ गोस्वामी जी
जिन चरणों की वंदना तीनों लोकों में होती है और जिनका आनंद अपार है, उन चरणों का वंदन स्वयं धरती को अपने फन पर धारण करने वाले शेषनाग भी करते हैं। [1]
जिनका वंदन हिमालय पर रहने वाले चंद्रचूड़ भगवान शिव भी करते हैं, और जिनका वंदन स्वयं सृष्टिकर्ता भगवान ब्रह्मा भी करते हैं। [2]
जिनका वंदन श्री हनुमान जी, ब्रजवासी और स्वर्गवासी सभी करते हैं। [3]
जिनका सेवन अनन्य रसिक शिरोमणि स्वामी श्री हरिदास जी, रूप-रस में उन्मत्त होकर करते हैं। श्री छबीले जी कहते हैं कि ऐसे हैं भक्तों के मन को भाने वाले श्री बाँके बिहारी जी के चरण। [4]
वन्दत है तीनों लोक, आनंद अपार मान,
वन्दे वन्दनीय शेष, धरणी के धरन हैं। [1]
वन्दे नित चन्द्र चूड़, हिमगिर में वास करें,
ब्रह्मा जी वन्दें, सब सृष्टि के करन हैं॥ [2]
वन्दे हनुमान, आन मानें जग जाकी आज,
वन्दे ब्रज वासी, स्वर्गवासी हू शरन हैं। [3]
सेवैं हरिदास रूप राशि में 'छबीले' रम्य,
भक्त मन भावते बिहारी के चरण हैं॥ [4]
- श्री छबीले वल्लभ गोस्वामी जी
जिन चरणों की वंदना तीनों लोकों में होती है और जिनका आनंद अपार है, उन चरणों का वंदन स्वयं धरती को अपने फन पर धारण करने वाले शेषनाग भी करते हैं। [1]
जिनका वंदन हिमालय पर रहने वाले चंद्रचूड़ भगवान शिव भी करते हैं, और जिनका वंदन स्वयं सृष्टिकर्ता भगवान ब्रह्मा भी करते हैं। [2]
जिनका वंदन श्री हनुमान जी, ब्रजवासी और स्वर्गवासी सभी करते हैं। [3]
जिनका सेवन अनन्य रसिक शिरोमणि स्वामी श्री हरिदास जी, रूप-रस में उन्मत्त होकर करते हैं। श्री छबीले जी कहते हैं कि ऐसे हैं भक्तों के मन को भाने वाले श्री बाँके बिहारी जी के चरण। [4]

