जो उपदेसै और कौं, सो नहिं मानै आप - श्री भगवत रसिक जी की वाणी, निर्विरोध मनरंजन (12)

जो उपदेसै और कौं, सो नहिं मानै आप - श्री भगवत रसिक जी की वाणी, निर्विरोध मनरंजन (12)

जो उपदेसै और कौं, सो नहिं मानै आप ।
देखौ जगत प्रबीनता, ठगे आपकौं आप ।। [1]
ठगै आपकौं आप, विषै स्वारथ नहिं छूटै ।
परमारथ पर - हेत, बकै, पर धन कौं लूटे ।। [2]
पंडित, संत महंत, गुसाईं, परमहंस जो ।
लोभ - ग्रसे सब लोग, नहीं भगवत सहाय जो ।। [3]

- श्री भगवत रसिक, भगवत रसिक की वाणी, निर्विरोध मनरंजन (12)

उपदेशक (पंडित, संत, महंत, गुसाईं, परमहंस आदि ) - दूसरों को जो शिक्षा देते हैं, उस पर स्वयं अमल नहीं करते। संसार की होशियारी (मूर्खता) तो देखिये कि यह जान बुझकर अपने आप को धोखा देता रहता है । [1] 

यह दूसरों के लिए तो परमार्थ की बात करता है, किंतु उसका स्वयं का स्वार्थ और विषयासक्ति नहीं छूटते । वे परमार्थ हित का तो बकते हैं परंतु दूसरों के धन पर इनकी नज़र होती है और उसको लूटने का काम करते हैं  । [2]

श्री भगवतरसिकजी कहते हैं कि पंडित, संत, महंत, गुसाईं परमहंस आदि जो लोभ से ग्रसित है और सदा दूसरों का धन ऐंठने में लगे रहते हैं, कभी भगवत् प्राप्ति में सहायक नहीं हो सकते । [3]