अधर अरुन तेरे कैसे कै दुराऊँ । [1]
रबि ससि संक भजन कियौ अपबस
अद्भुत रंगनि कुसुम बनाऊँ ॥ [2]
शुभ कौशेय कसि ब कौस्तुभ मणि
पंकज सुतनि लै अँगनि लिपाऊँ । [3]
हरषित इंदु तजत जैसे जलधर
सो भ्रम ढूंढि कहाँ हौं पाऊँ ॥ [4]
अंबुन दंभ कछू नहि ब्यापत
हिमकर तपै ताहि कैसै कै बुझाऊँ । [5]
हित हरिबंश रसिक नवरँग पिय
भृकुटी भौंह तेरे षंजन लराऊँ ॥ [6]
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित चौरासी (14)
(हित सखि ने कहा -) हे रसिक वर लाल ! आपके अत्यन्त अरुण अधरों का राग किस प्रकार छिपाऊँ ? [1]
यदि मैं कदाचित् उन अधरों की अद्भुतता कुसुम रंगों से रंजित करूँ तो भी मुझे रवि शशि रूप प्रेम की आशङ्का है । (अर्थात् ताप शैत्य उभय गुण विशिष्ट प्रेम आपके अधरों में वैवर्ण्य, शुष्कता, कम्पन आदि रूपों में प्रियतमा दर्शन के समय प्रकट हो ही जायगा । तब मेरा रङ्ग निर्माण रूप प्रयास व्यर्थ होगा ।) [2]
यदि आपके कौस्तुभ मणि को उज्वल कौशेय वस्त्रों से छिपा दिया जाय और पङ्कज पराग के लेपन पूर्वक आपकी श्याम अंग कान्ति का अदर्शन भी कर दूँ किन्तु जब जलद अवगुण्ठन से निर्मुक्त चन्द्रमा की भाँति आपका श्रीमुख उल्लसित हो उठेगा (और इससे आपका भेद खुलने लगेगा, तब मैं वहाँ पर श्रीप्रिया के सम्मुख) कौन सा मिष (संभ्रम) उपस्थित करूँगी ? [3]
तब तो उस समय यहाँ पर श्रीप्रियाजी के समक्ष न शीतल वचन काम देंगे और न दम्भ, छल या कृत्तिमता ही सफल हो सकेगी । [4]
अरे! जब चन्द्रवत! शीतल स्वभाव मयी श्रीप्रिया ही तप्त (कुपित) हो उठेंगी तब मैं उन्हें किन वचनों के द्वारा शान्त व प्रबोधित करूंगी । [5]
श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु कहते हैं "किन्तु फिर भी हे रसिक नायक प्रियतम! आपके खञ्जन वत् चपल नयनों का श्रीराधा की भृकुटियों से अवश्य मिलन करा दूंगी ।" [6]
रबि ससि संक भजन कियौ अपबस
अद्भुत रंगनि कुसुम बनाऊँ ॥ [2]
शुभ कौशेय कसि ब कौस्तुभ मणि
पंकज सुतनि लै अँगनि लिपाऊँ । [3]
हरषित इंदु तजत जैसे जलधर
सो भ्रम ढूंढि कहाँ हौं पाऊँ ॥ [4]
अंबुन दंभ कछू नहि ब्यापत
हिमकर तपै ताहि कैसै कै बुझाऊँ । [5]
हित हरिबंश रसिक नवरँग पिय
भृकुटी भौंह तेरे षंजन लराऊँ ॥ [6]
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित चौरासी (14)
(हित सखि ने कहा -) हे रसिक वर लाल ! आपके अत्यन्त अरुण अधरों का राग किस प्रकार छिपाऊँ ? [1]
यदि मैं कदाचित् उन अधरों की अद्भुतता कुसुम रंगों से रंजित करूँ तो भी मुझे रवि शशि रूप प्रेम की आशङ्का है । (अर्थात् ताप शैत्य उभय गुण विशिष्ट प्रेम आपके अधरों में वैवर्ण्य, शुष्कता, कम्पन आदि रूपों में प्रियतमा दर्शन के समय प्रकट हो ही जायगा । तब मेरा रङ्ग निर्माण रूप प्रयास व्यर्थ होगा ।) [2]
यदि आपके कौस्तुभ मणि को उज्वल कौशेय वस्त्रों से छिपा दिया जाय और पङ्कज पराग के लेपन पूर्वक आपकी श्याम अंग कान्ति का अदर्शन भी कर दूँ किन्तु जब जलद अवगुण्ठन से निर्मुक्त चन्द्रमा की भाँति आपका श्रीमुख उल्लसित हो उठेगा (और इससे आपका भेद खुलने लगेगा, तब मैं वहाँ पर श्रीप्रिया के सम्मुख) कौन सा मिष (संभ्रम) उपस्थित करूँगी ? [3]
तब तो उस समय यहाँ पर श्रीप्रियाजी के समक्ष न शीतल वचन काम देंगे और न दम्भ, छल या कृत्तिमता ही सफल हो सकेगी । [4]
अरे! जब चन्द्रवत! शीतल स्वभाव मयी श्रीप्रिया ही तप्त (कुपित) हो उठेंगी तब मैं उन्हें किन वचनों के द्वारा शान्त व प्रबोधित करूंगी । [5]
श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु कहते हैं "किन्तु फिर भी हे रसिक नायक प्रियतम! आपके खञ्जन वत् चपल नयनों का श्रीराधा की भृकुटियों से अवश्य मिलन करा दूंगी ।" [6]

