निधाय श्यामांसे निजभुजलतामिंदु - श्री विट्ठलनाथ जी (गुसाईं जी), श्री स्वामिनियाष्टकम् (4)

निधाय श्यामांसे निजभुजलतामिंदु - श्री विट्ठलनाथ जी (गुसाईं जी), श्री स्वामिनियाष्टकम् (4)

निधाय श्यामांसे निजभुजलतामिंदु वदनं कटाक्षैः पश्यंती कुवलय दलाक्षी मधुपतेः ॥
मुदा गायन्ती या मधुर मुरली जात निनदानुसारं तारं सा फलतु मम राधावदनयोः ॥

- श्री विट्ठलनाथ जी (गुसाईं जी), श्री स्वामिनियाष्टकम् (4)
 
जिन्होंने श्री श्याम सुन्दर के स्कन्धों पर भुजलता अर्पित किये हुए हैं, जो कमल के समान खिले निज नेत्रों की दृष्टि से निहार लाल जी [श्री कृष्ण] को प्रेम की वर्षा करने वाली चंद्रवदना हैं, जिनका अति हर्ष से गान कर श्री लालजी का स्वर से स्वर मिला मुरली वादन करना मंजुल है, ऐसी श्री राधा का दर्शन कर मैं कब कृतार्थ होऊँगा?