मैं तो आई वृन्दावन धाम किशोरी तेरे चरनन में ।
किशोरी तेरे चरनन में, श्यामा जू तेरै चरनन में ॥ [1]
वृज वृन्दावन की महारानी, मुक्ति भी यहाँ भरती पानी ।
तेरे चरण पड़े चारों धाम, किशोरी तेरे चरनन में ॥ [2]
करो कृपा की कोर श्रीराधे, दीन जनन की ओर श्रीराधे ।
मेरी विनती है आठों याम, किशोरी तेरे चरनन में ॥ [3]
बाँके ठाकुर की ठकुरानी, वृन्दावन जिनकी रजधानी ।
तेरे चरण पलोटे श्याम, किशोरी तेरे चरनन में ॥ [4]
करो कृपा ना कीजै देरी, सखी लघु चरनन की चेरी ।
तेरे चरणों में है विश्राम, किशोरी तेरे चरनन में ॥ [5]
मुझे बना लो अपनी दासी; चाहत नित ही महल खवासी ।
मुझे और न जग से काम, किशोरी तेरे चरनन में ॥ [6]
- ब्रज के लोकगीत
हे श्री राधा, मैं श्री वृन्दावन में आपकी शरण में आयी हूँ । हे मैं किशोरिजी आपके चरणों में आयी हूँ । [1]
हे ब्रज की महारानी, यहाँ मुक्ति भी पानी भरती है, चारों धाम आपके द्वार पर पड़े हैं । [2]
हे श्री राधे, मैं आठों याम आपके चरणों में विनती करता हूँ की मुझ दीन पर अपनी कृपा की कोर कीजिये । [3]
हे किशोरी, आप बांके ठाकुर की ठकुरानी हो, आपकी राजधानी श्री वृन्दावन है, श्री श्यामसुंदर भी आपको सुख प्रदान करने के लिए आपके चरण दबाते हैं । [4]
श्री लघु सखी कहती हैं "हे श्री राधा, मुझपर कृपा कीजिये, मैं आपके चरणों की शरण में आयी हूँ, मैं आपके चरणों की दासी हूँ, अब और देरी न कीजिये, मेरा विश्राम तो आपके चरणों में ही है ।" [5]
हे श्री किशोरी, मुझे अपनी दासी बना लीजिये, मेरी यही अभिलाषा है की मैं आपके निज महल में आपकी दासी बनूँ, मुझे अब इस संसार से कोई काम नहीं है, मैं आपके चरणों की शरण में आयी हूँ । [6]
किशोरी तेरे चरनन में, श्यामा जू तेरै चरनन में ॥ [1]
वृज वृन्दावन की महारानी, मुक्ति भी यहाँ भरती पानी ।
तेरे चरण पड़े चारों धाम, किशोरी तेरे चरनन में ॥ [2]
करो कृपा की कोर श्रीराधे, दीन जनन की ओर श्रीराधे ।
मेरी विनती है आठों याम, किशोरी तेरे चरनन में ॥ [3]
बाँके ठाकुर की ठकुरानी, वृन्दावन जिनकी रजधानी ।
तेरे चरण पलोटे श्याम, किशोरी तेरे चरनन में ॥ [4]
करो कृपा ना कीजै देरी, सखी लघु चरनन की चेरी ।
तेरे चरणों में है विश्राम, किशोरी तेरे चरनन में ॥ [5]
मुझे बना लो अपनी दासी; चाहत नित ही महल खवासी ।
मुझे और न जग से काम, किशोरी तेरे चरनन में ॥ [6]
- ब्रज के लोकगीत
हे श्री राधा, मैं श्री वृन्दावन में आपकी शरण में आयी हूँ । हे मैं किशोरिजी आपके चरणों में आयी हूँ । [1]
हे ब्रज की महारानी, यहाँ मुक्ति भी पानी भरती है, चारों धाम आपके द्वार पर पड़े हैं । [2]
हे श्री राधे, मैं आठों याम आपके चरणों में विनती करता हूँ की मुझ दीन पर अपनी कृपा की कोर कीजिये । [3]
हे किशोरी, आप बांके ठाकुर की ठकुरानी हो, आपकी राजधानी श्री वृन्दावन है, श्री श्यामसुंदर भी आपको सुख प्रदान करने के लिए आपके चरण दबाते हैं । [4]
श्री लघु सखी कहती हैं "हे श्री राधा, मुझपर कृपा कीजिये, मैं आपके चरणों की शरण में आयी हूँ, मैं आपके चरणों की दासी हूँ, अब और देरी न कीजिये, मेरा विश्राम तो आपके चरणों में ही है ।" [5]
हे श्री किशोरी, मुझे अपनी दासी बना लीजिये, मेरी यही अभिलाषा है की मैं आपके निज महल में आपकी दासी बनूँ, मुझे अब इस संसार से कोई काम नहीं है, मैं आपके चरणों की शरण में आयी हूँ । [6]

