(राग मलार)
झूलत दोऊ नवल हिंडोलैं ।
विमल पुलिन कल कमल कुंज मधि चितवत नैन सलोलैं ॥ [1]
जोबन जोर झकोरनि देत आलिंगन करत कलोलैं ।
सरसदासि सुखरासि रहसि नव सुनत मधुर मृदु बोलैं ॥ [2]
- श्री सरस देव जी, श्री सरस देव जी की वाणी, सरस विहार रस के पद (22)
श्रीप्रियालाल यमुना-पुलिनस्थ कमल-कुञ्ज में एक नये ही प्रकार के झूले में झूल रहे हैं और दोनों एक-दूसरे को प्रेम-प्रफुल्लित विलोचनों से निहार रहे हैं । [1]
नवयौवन की उल्लसित तरंगें जब दोनों को झोटे देती हैं, तब वे आलिंगन बद्ध हो रस-रंग में निमग्न हो जाते हैं । नित्यविहारी श्यामा-श्याम की इस परम गोपनीय रसमयी ऐकान्तिक विलास लीला के समय अभिव्यक्त होने वाली सरस वचनावली को सुन-सुन कर स्वामी श्रीसरसदास जी अलौकिक सुखराशि में निमग्न हो रहे हैं । [2]
झूलत दोऊ नवल हिंडोलैं ।
विमल पुलिन कल कमल कुंज मधि चितवत नैन सलोलैं ॥ [1]
जोबन जोर झकोरनि देत आलिंगन करत कलोलैं ।
सरसदासि सुखरासि रहसि नव सुनत मधुर मृदु बोलैं ॥ [2]
- श्री सरस देव जी, श्री सरस देव जी की वाणी, सरस विहार रस के पद (22)
श्रीप्रियालाल यमुना-पुलिनस्थ कमल-कुञ्ज में एक नये ही प्रकार के झूले में झूल रहे हैं और दोनों एक-दूसरे को प्रेम-प्रफुल्लित विलोचनों से निहार रहे हैं । [1]
नवयौवन की उल्लसित तरंगें जब दोनों को झोटे देती हैं, तब वे आलिंगन बद्ध हो रस-रंग में निमग्न हो जाते हैं । नित्यविहारी श्यामा-श्याम की इस परम गोपनीय रसमयी ऐकान्तिक विलास लीला के समय अभिव्यक्त होने वाली सरस वचनावली को सुन-सुन कर स्वामी श्रीसरसदास जी अलौकिक सुखराशि में निमग्न हो रहे हैं । [2]

