दोउ चकोर, दोउ चंद्रमा, दोउ अलि, पंकज दोउ ।
दोउ चातक, दोउ मेघ प्रिय, दोउ मछरी, जल दोउ ॥ [1]
आस्रय - आलंबन दोउ, विषयालंबन दोउ ।
प्रेमी प्रेमास्पद दोउ, तत्सुख - सुखिया दोउ ॥ [2]
लीला आस्वादन निरत महाभाव - रसराज ।
वितरत रस दोउ दुहुन कौं, रचि बिचित्र सुठि साज ॥ [3]
सहित बिरोधी धर्म-गुन जुगपत नित्य अनंत ।
बचनातीत अचिंत्य अति, सुषमामय श्रीमंत ॥ [4]
श्रीराधा - माधव - चरन बंदौं बारंबार ।
एक तत्त्व दो तनु धरें, नित रस - पारावार ॥ [5]
- श्री हनुमान प्रसाद पोद्दार, पद-रत्नाकर, षोडश गीत (1)
दोनों श्री राधा कृष्ण चकोर (वह पक्षी जो चन्द्रमा के प्रेम में विभोर रहता है) हैं, दोनों चन्द्रमा (चकोर का प्रेमास्पद) हैं, दोनों भ्रमर हैं और दोनों कमल पुष्प भी हैं । दोनों चातक हैं (वह पक्षी जो श्याम मेघ से प्रेम करता है) और दोनों मेघ हैं (चातक पक्षी का प्रेमास्पद), दोनों जल हैं एवं दोनों मछली भी हैं । [1]
दोनों एक दूसरे के आश्रय हैं एवं दोनों एक दूसरे के आलम्बन हैं, दोनों एक दूसरे के विषयलंबन भी हैं । दोनों एक-दूसरे के प्रेमी हैं एवं प्रेमास्पद भी, दोनों एक-दूसरे के सुख में ही सुखी रहते हैं । [2]
महाभाव श्री राधा एवं रसराज श्री कृष्ण नित्य ही लीला रस के आस्वादन में निरत रहते हैं । विभिन्न साजों से दोनों एक-दूसरे को रस वितरण करते रहते हैं । [3]
दोनों एक-दूसरे से परस्पर विरोधी लक्षणों और विशेषताओं से युक्त हैं जो वाणी एवं चिंतन से परे हैं, और उत्कृष्ट आकर्षण और लालित्य से भरे हुए हैं । [4]
मैं श्री राधा और श्री कृष्ण के चरणों में बार-बार नमन करता हूँ, एक ही तत्व दो रूपों में प्रकट हुआ है, जो नित्य महारस के महासागर हैं । [5]
दोउ चातक, दोउ मेघ प्रिय, दोउ मछरी, जल दोउ ॥ [1]
आस्रय - आलंबन दोउ, विषयालंबन दोउ ।
प्रेमी प्रेमास्पद दोउ, तत्सुख - सुखिया दोउ ॥ [2]
लीला आस्वादन निरत महाभाव - रसराज ।
वितरत रस दोउ दुहुन कौं, रचि बिचित्र सुठि साज ॥ [3]
सहित बिरोधी धर्म-गुन जुगपत नित्य अनंत ।
बचनातीत अचिंत्य अति, सुषमामय श्रीमंत ॥ [4]
श्रीराधा - माधव - चरन बंदौं बारंबार ।
एक तत्त्व दो तनु धरें, नित रस - पारावार ॥ [5]
- श्री हनुमान प्रसाद पोद्दार, पद-रत्नाकर, षोडश गीत (1)
दोनों श्री राधा कृष्ण चकोर (वह पक्षी जो चन्द्रमा के प्रेम में विभोर रहता है) हैं, दोनों चन्द्रमा (चकोर का प्रेमास्पद) हैं, दोनों भ्रमर हैं और दोनों कमल पुष्प भी हैं । दोनों चातक हैं (वह पक्षी जो श्याम मेघ से प्रेम करता है) और दोनों मेघ हैं (चातक पक्षी का प्रेमास्पद), दोनों जल हैं एवं दोनों मछली भी हैं । [1]
दोनों एक दूसरे के आश्रय हैं एवं दोनों एक दूसरे के आलम्बन हैं, दोनों एक दूसरे के विषयलंबन भी हैं । दोनों एक-दूसरे के प्रेमी हैं एवं प्रेमास्पद भी, दोनों एक-दूसरे के सुख में ही सुखी रहते हैं । [2]
महाभाव श्री राधा एवं रसराज श्री कृष्ण नित्य ही लीला रस के आस्वादन में निरत रहते हैं । विभिन्न साजों से दोनों एक-दूसरे को रस वितरण करते रहते हैं । [3]
दोनों एक-दूसरे से परस्पर विरोधी लक्षणों और विशेषताओं से युक्त हैं जो वाणी एवं चिंतन से परे हैं, और उत्कृष्ट आकर्षण और लालित्य से भरे हुए हैं । [4]
मैं श्री राधा और श्री कृष्ण के चरणों में बार-बार नमन करता हूँ, एक ही तत्व दो रूपों में प्रकट हुआ है, जो नित्य महारस के महासागर हैं । [5]

