(कवित्त)
दया की निधान गुनवान रसखान राधे,
रस की ढरन सो तनक तन हेरिये। [1]
मैं तू हूँ अधम महापातकी कुटिल अति,
मेरी गति मति प्यारी अपनी ओर फेरिये॥ [2]
साधन हीन दीन बल काहु को न मोहि श्यामा,
निज कृपा बल सो मो निर्बल को देखिये। [3]
तेरे द्वार आयो ब्रजवासी भिखारी आज,
'प्रिया' प्रेम भीख याकी झोली माँही गेरिये॥ [4]
- श्री प्रिया दास
हे दया की निधान, गुणों की खान, रस की खान श्री राधे! कृपा करके मुझ पर अपनी रस भरी दृष्टि डालिए। [1]
मैं अधम, महापतित और कुटिल जीव हूँ, किसी भी तरह से मेरी गति और मति को अपनी ओर मोड़ लीजिए, हे प्यारी जू। [2]
हे श्यामा जू, मैं साधनहीन और दीन हूँ। मेरे लिए आपके अलावा कोई नहीं है, कृपा कर मुझ निर्बल जीव पर अपनी करुणा की दृष्टि डालिए। [3]
दया की निधान गुनवान रसखान राधे,
रस की ढरन सो तनक तन हेरिये। [1]
मैं तू हूँ अधम महापातकी कुटिल अति,
मेरी गति मति प्यारी अपनी ओर फेरिये॥ [2]
साधन हीन दीन बल काहु को न मोहि श्यामा,
निज कृपा बल सो मो निर्बल को देखिये। [3]
तेरे द्वार आयो ब्रजवासी भिखारी आज,
'प्रिया' प्रेम भीख याकी झोली माँही गेरिये॥ [4]
- श्री प्रिया दास
हे दया की निधान, गुणों की खान, रस की खान श्री राधे! कृपा करके मुझ पर अपनी रस भरी दृष्टि डालिए। [1]
मैं अधम, महापतित और कुटिल जीव हूँ, किसी भी तरह से मेरी गति और मति को अपनी ओर मोड़ लीजिए, हे प्यारी जू। [2]
हे श्यामा जू, मैं साधनहीन और दीन हूँ। मेरे लिए आपके अलावा कोई नहीं है, कृपा कर मुझ निर्बल जीव पर अपनी करुणा की दृष्टि डालिए। [3]
हे प्यारी जू, आपके द्वार पर एक ब्रजवासी में डूबा हुआ भिखारी आया है। मुझे भीख में प्रेम रूपी धन दीजिए। [4]

