सेवाकुञ्ज जाके ब्रजधूल को चढ़ाओ शीस - डंडी स्वामी श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’, वृंदावन शतक (65)

सेवाकुञ्ज जाके ब्रजधूल को चढ़ाओ शीस - डंडी स्वामी श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’, वृंदावन शतक (65)

सेवाकुञ्ज जाके ब्रजधूल को चढ़ाओ शीस,
नीके कर तमाल तरु पेख लो पेख लो। [1]
देखो दिव्य रास नित्य वंशीवट विहारी का,
बाँके बिहारी जी को परेख लो परेख लो॥ [2]
बार बार जीवन अलभ्य नहीं मिलता ये,
प्यारे प्रिया प्रियतम को लेख लो लेख लो। [3]
आओ मित्र! आओ लाभ लोचन उठाओ शीघ्र,
वृन्दावन - निकुञ्ज - छवि देख लो देख लो॥ [4]

- डंडी स्वामी श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’, वृंदावन शतक (65)

वृंदावन के सेवाकुंज वन में जाओ और वहाँ की पावन रज को अपने सिर पर लगाओ; वहाँ सुहावने तमाल वृक्षों का सौंदर्य निहार लो। [1]

बंशीवट में श्री बांके बिहारी जी की नित्य दिव्य रास लीला का दर्शन करो; उन श्री बांके बिहारी जी को पहचानो, वे ही हमारे अपने हैं, और हम उनके। [2]

यह अमूल्य जीवन आपको बार-बार नहीं मिलेगा; हे भाई! अपने मन में युगल किशोर श्री राधा कृष्ण की छवि सदा के लिए अंकित कर लो। [3]

आओ मित्र, इन नेत्रों का लाभ उठाएं और वृंदावन के विभिन्न निकुंजों का दर्शन कर लें। [4]