रसमय स्वाभाविक, बिना स्वारथ - श्री रसखान, प्रेम वाटिका (42)

रसमय स्वाभाविक, बिना स्वारथ - श्री रसखान, प्रेम वाटिका (42)

रसमय स्वाभाविक, बिना स्वारथ, अचल महान ।
सदा एक रस बढ़त नित, सुद्ध प्रेम रसखान ॥

- श्री रसखान, प्रेम वाटिका (42)

जो प्रेम स्वभाव से ही रसमय हो, जिसमें किसी प्रकार का स्वार्थ न हो, जो अचल और महान हो, जो सदा एकरस रहते हुए निरंतर बढ़ता जाए—उसी को शुद्ध प्रेम कहा जाता है, हे रसखान; वही प्रेम साधना का परम लक्ष्य है।