श्री लाल बलबीर (बद्रीप्रसादजी) की जीवनी

श्री लाल बलबीर (बद्रीप्रसादजी) की जीवनी

परिचय :
वृन्दावन में एक से एक उत्कृष्ट कवि, आचार्य, ज्ञानी, भक्त, रसिक तथा मनीषी हुए हैं ऐसे प्रकृत भक्त कवियों में 'लाल बलवीर' (बद्रीविशाल) का नाम भी उल्लेखनीय है ।
 
जन्म-शिक्षा :
श्रीवृन्दावन बनखंडी महादेव के सन्निकट व्यास घेरा में लाला रामलालजी अग्रवाल निवास करते थे, उनके पाँच पुत्र हुए । उनमें सबसे बड़े पुत्र व्रजविनोदकार लाला बद्रीप्रसाद (लाल बलवीर) थे । उनका जन्म अनुमानतः 1829 - 1838 के लगभग हुआ था ऐसा लाला बांकेलालजी का कहना है । 
इन्होंने वंश, आदि का परिचय निम्न दोहे में इस प्रकार दिया है -
 
"विदित वैश्य परिवार, चार जुग विधि निज रचे शरीर ।
रामलाल को सुवन है, नाम लाल बलवीर ।।
 
रामलालजी साधु सन्तों में विशेष निष्ठा रखते थे । देवदर्शन-सत्संग भगवन्नाम जपादि साधनों के साथ-साथ वे अपनी कुल परम्परा के अनुसार व्यापार व्यवसाय करते थे । उन्हीं की प्रकृति के अनुसार उनके आत्मजों की भी प्रवृत्ति होना स्वाभाविक है । उस समय देश में शिक्षा का प्रचार-प्रसार आज जितना नहीं था । स्कूल पाठशालायें बहुत कम ही थीं, अतः बद्रीप्रसादजी को यद्यपि साधारण शिक्षा ही प्राप्त हुई थी । तथापि सत्संग के द्वारा उन्हें बोध अच्छा हो गया था जिसके कारण बाल्यकाल से ही भगवद्भक्ति की ओर उनका झुकाव हो गया था । कविता करने की प्रवृत्ति भी उनमें स्वाभाविक थी । 
 
विवाह :
मथुरा में घीयामंडी दूसरवाली गली में एक चम्पालाल अग्रवाल थे, ये हलवाई का कार्य करते थे । उनकी स्त्री का नाम पकोड़ीबाई था । उनके दो कन्यायें थीं एक का नाम चन्दा और दूसरी का नाम सरस्वती था।  चन्दा का विवाह लाल बलबीर से हुआ । उनके सन्तलाल, लडैतीलाल, बाँकेलाल, रामस्वरूप और पूरनचन्द ये पाँच पुत्र और भगवान देवी नामक एक सुता हुई । 
 
व्यवसाय :
बद्रीप्रसाद ने आर्थिक विकास पर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया था । वे महन्त सुदर्शनदास (बनखंडी मुहल्ला) की एक छोटी-सी दुकान में तम्बाखू कूट कूटकर बेचा करते थे और उसी से अपना पूरा गृह खर्च चला लेते थे । 
उनकी दुकान पर सदा सर्वदा बीसों व्यक्ति बने रहते थे । कविता पाठ का प्रवाह दिन रात चलता रहता था । तम्बाखू खरीदने वाले या मार्ग में चलने वाले ने कोई कहीं की तुक आरम्भ करदी तो उसी प्रसङ्ग की कवितायें घंटों तक उड़ती रहती थीं । उसे सुन सुनकर पथिकों की भीड़ लग जाती थी । राजा रईस चाहे कोई भी हो उधर होकर जाता, वह भीड़ को देखकर पाँच मिनट के लिए रुक ही जाता । इस साधारण व्यवसाय में ही लाला बद्रीप्रसाद कवितामृत पान करके स्वर्ग की सुधा से भी बढ़कर आनन्दानुभव करते थे । 
बद्री विशाल 'लाल बलबीर' जनकवि थे । उनका काव्य सामान्य जनों का कंठहार था ।
वृन्दावनवास, यमुनास्नान का महालाभ और भगवतप्रसाद पाकर अनन्यभक्त का जीवन यापन करते हुए लाल बलबीर काव्य-साधना में रत रहते थे । ये श्री राधा के एकनिष्ठ भक्त थे । राधा भक्तिभाव में विभोर होकर इन्होंने 'राधाष्टक' की रचना की थी । 
व्यायाम का प्रचार वृन्दावन ही नहीं समस्त व्रजमंडल में उन दिनों विशेष था । बद्रीप्रसाद प्रतिदिन अन्तर्यामी एवं दलेल के अखाड़ों में व्यायाम करने के लिये नियम से जाते थे । कुशती भी लड़ते थे और तुकबन्दियाँ भी करते थे ।
 
साधना :
बनखंडी मुहल्ले में ही जगद्गुरु श्रीनिम्बार्काचार्य श्री श्रीजी महाराज की एक कुञ्ज है जो श्रीजी की छोटी एवं नई कुञ्ज के नाम से प्रसिद्ध है । उसमें एक भजनानन्दी वयोवृद्ध महात्मा श्रीकृष्णदासजी रहा करते थे । वे श्रीजी महाराज के अधिकारी थे । उन दिनों वृन्दावनस्थ सभी कुञ्जों एवं मथुरा की जायदाद का प्रबन्ध उन्हीं के हाथों में था । लाला बद्रीप्रसाद की बचपन से ही उनमें निष्ठा हो गई थी । वह नियमपूर्वक प्रति दिन एक बार उनके अवश्य दर्शन करते थे । उनके अनुज प्रियादास (प्रेमसखी) ने तो श्रीकृष्णदासजी से विरक्त दीक्षा लेकर घरबार ही छोड़ दिया था, उन्होंने ब्याह भी नहीं किया था । वे आमरण साधु रूप में रहे थे । अपनी रचनाओं में उन्होंने श्रीनिम्बार्क, श्रीभट्ट, श्रीहरिव्यास, श्रीपरशुराम आदि का स्मरण करके उनकी परम्पराओं में होने वाले अपने (प्रेमसखी के) गुरुदेव श्रीकृष्णदासजी के रहस्य नाम श्रीकृष्णअली का अनेकों रचनाओं में स्पष्ट उल्लेख किया है । उन्हीं को लाल बलवीर ने अपना गुरुदेव बतलाया है ।
लाल बलबीर ने अपने पदों में अपने गुरु "श्री कृष्णदास जी (कृष्ण अली)" का अनेक स्थलों पर स्मरण किया है, जो निम्बार्क संप्रदाय के अनुयायी थे । 
"कृष्ण अली पद कमल बल षडऋतु शतक बषान"
 
"रहौ लाल बलबीर सिर, कृष्ण अली पद धूर"

"अति मतिहीन दीन बावरी हौं स्वामिनि जू,
एहौ कृष्ण अली चेरी रावरी कहाऊँ मैं ।"
 
नाम जप और भगवत्स्मरण आदि साधना तो कविता पाठ व निर्माण में निरन्तर चलता ही रहता था, समय-समय पर कथा, सत्संग, नाम-संकीर्तनादि में भी भाग लेते रहते थे । वृन्दावन और श्रीगिरिराज की परिक्रमा में उनकी विशेष रुचि रहती थी । यों तो जब इच्छा होती तभी गिरिराज की परिक्रमा कर आते, किन्तु आषाढ़ शुक्ला 15 को विशेष समारोह पूर्वक परिक्रमा करते थे । वे 5-7 साथियों के साथ एक सप्ताह पूर्व ही वहाँ पहुँच जाते थे । प्रतिदिन परिक्रमा करना और परिक्रमा के प्रत्येक स्थल पर रुककर अपने कवित्त-सवैया सुनाना उनका क्रम रहता था । जिस स्थल पर विश्राम करते वहीं दाल-बाटी बनती । सभी साथी बराबर का खर्चा करते किन्तु बद्रीप्रसाद दुगुने पैसे देते थे, क्योंकि विशाल शरीर होने के कारण उनकी भोजन की मात्रा भी अधिक थी । गुरु- (व्यास) पूर्णिमा को गिरिराज की परिक्रमा पूर्ण करके वहाँ से ही वे बरसाना-नन्दगाँव चले जाते । श्रीजी और नन्दलला के दर्शन करते । वहाँ भी कवि गोष्ठियां होतीं । जब बरसाने में श्रीकिशोरीजी के नख-शिख का वर्णन सुनाते तो प्रेम विभोर श्रोताजन समाधिस्थवत स्तब्ध रह जाते थे ।
श्रीवृन्दावन में भी वसन्तपंचमी को प्रतिवर्ष श्रीरंगनाथ के बगीचा में वसन्त उत्सव होता था, उसमें बद्रीप्रसाद भी आमन्त्रित किये जाते थे । अपने साथियों के साथ वे सम्मिलित होते, डटकर कविता पाठ चलता । कवित्त, सवैया आदि विविध छन्दों की सुन्दर वर्षा होती रहती थी । बहुत से प्रेमीजन उन्हें लिख भी लेते थे । बुन्देलखण्ड के समथर-पन्ना आदि नगरों में एवं दतिया-झांसी की ओर लाल बलवीर की कविताओं की अच्छी प्रसिद्धि रही है । दोहा, कवित्त, सवैया तथा पद आदि छन्दों के अतिरिक्त आरम्भ में इन्होंने स्वांगों की भी रचना की थी, उनमें 'विशनदेवा' आदि स्वांग वृन्दावन में बड़े सुन्दर ढंग से रङ्गमन्च पर खेले गये थे । वे जब बाँके बिहारी के दर्शन करने जाते तो अनेक सेवैया एवं कवित्त सुनाते जिसको सुनकर सब मंत्र मुग्ध हो जाते थे ।
 
शिष्य :
बुद्धि लखेरा, दुर्गा सुनार, शिवलाल भाट और दामोदर 'दम्पत्ति किशोर' लाल बलबीर के शिष्य थे ।  
 
रचना :
कविवर लाल बलवीर प्रतिभा सम्पन्न कवि थे । इनकी काव्य रचनाएँ इनके समय में ही प्रकाशित हो गई थी - जो 'व्रज विनोद' अथवा 'बलबीर हजारा' नामक ग्रन्थों में संग्रहीत हैं । वृन्दावनशतक, पावस बत्तीसी, गिरिराज अष्टक, षड् ऋतु शतक, राधा शतक, 'मानपच्चीसी' 'प्रिया जू को सिख-नख' और 'नख - शिख वर्णन' 'प्रेम पंचासिका, 'राधाकृष्ण लीला परक कवित्त आदि रचनाएँ बलबीर हजारा में संकलित हैं । 
वन्द साहित्य में 'वृक्षवन्द,' 'भोजनवन्द,' 'पसारट' आदि भी हैं । 'विनोद पच्चीसी' इनकी अन्य रचना हैं । यह अभी तक अमुद्रित हैं । 'गोपीनाथ भर्तृहरी' भी इनकी रचना बताई जाती है किन्तु अभी तक अप्राप्त है ।
 
लाल बलवीर जी की प्राय: अधिकांश रचनाएँ श्री राधा, वृन्दावन, यमुना, श्रीकृष्ण आदि की भक्ति भावना से ओत-प्रोत हैं । वृन्दावन शतक में कवि ने वृन्दावन को भक्ति भाव से सुरतरु से अधिक महिमा मण्डित कहा है । तथा अभीष्टप्रद माना है ।
लाल बलवीर के छन्दों में 'लाल बलवीर' 'वलवीर' और 'दास' तीन नामों की छाप मिलती है । 
 
लीला संवरण :
श्रवण कृष्ण अमावस्या 1920 में श्री लाल बलवीर ने वृन्दावन में ही अपने देह का त्याग किया ।